आज मील थे सब अधिकार।
आज के दिन भागे थे फ़िरंगी,
लेकर के अपनी सरकार।।
आज का दिन तुम भूल न जाना,
आज मिली थी आज़ादी।
वीरों ने कुर्बानी देकर ,
सौंप दी भारत की चाबी।।
वीर सिपाही जब सरहद पर युद्ध मे जाने के लिए तैयार होता है तो अपने परिवार से कैसे विदा लेता है और क्या कहता है?
1)- पत्नी से विदा लेते समय एक वीर फौजी क्या कहता है देखे...
चला हुन आज सरहद पर, कफ़न सिर पर सजाकर मैं,
तेरे गजरे की ख़ुशबू को, चला मन में छुपाकर में
चुरा बहना की चंचलता , मुहब्बत थाम अपनों की
अजी नन्हीं सी चिड़िया को, चला दिल मे बसाकर मैं
2)-बहन से गले लिपट जाती है और कहती है , भाई आज तू मेरा भी प्रण सुनले, जिस तरह रानी लक्ष्मीबाई देश के लिए लड़ते लड़ते शहीद हो गयीं , वैसे मैं भी अपने देश की ख़ातिर लड़ना चाहती हूँ।...
सजाकर शस्त्र काँधे पर, चलूँगी साथ मैं वीरा
समझले आज सीमा पर, लड़ूँगी साथ मैं वीरा
उठा आक्रोश है दिल में, रगों में रक्त फौजी है
कदम पद चिन्ह पर तेरे, धरूँगी साथ मैं वीरा
3) भाई अपनी जिद्दी बहन को समझाता है क्या कहता है देखें......!
समझता हूँ तेरी हालत, लहू तेरा उबलता है
तू हिन्दुस्तां की बेटी है, तेरा दिल भी मचलता है
मगर तू बन कवच घर का, निभाना फ़र्ज़ मेरा तू
हवाले कर चमन तेरे, तेरा वीरा निकलता है
4)- जब वो वीर सिपाही माँ के पास जाता है तो
माँ क्या कहती है सुनें.....
सुनो बेटा न जाया हो, ये कुर्बानी शहीदों की
बचे ना नस्ल अब कोई, छुपे पाकी रकीबों की
तू चुन चुन कर मिटा देना, हुकूमत को हिला देना
मेरा आशीष तेरे सर , मदद करना रफ़ीकों
की
5)- बेटा माँ को विश्वास दिलाता है और क्या जबाब देता है देखें .....
रचूँगा एक नया मंज़र, नए करतब दिखाकर मैं
तजा सुख चैन अब सारा, चला आशी पाकर मैं
मिटाऊँगा सभी आतंक, कसम तेरी उठाई माँ
चुकाने को तेरा ऋण अब , चला सिर को उठाकर मैं
© डॉ० प्रतिभा 'माही'
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