साहित्य सागर [भाग - 01]
डॉ०प्रतिभा माही (पंचकुला)
उल्फत का फसाना
उल्फत का फसाना क्या कहना
उसका नज़राना क्या कहना
रुख़ से पर्दा हट जाए तो
लब का मुस्काना क्या कहना
तू मस्त फ़िज़ाओं सी क़ातिल
पल पल उकसाना क्या कहना
ये पेचोखम भी कम ना थे
अब नैन मिलाना क्या कहना
जब छम छम छनके झांझरिया
कटि का बलखाना क्या कहना
निर्झर झरता सावन 'माही'
अमृत बरसाना क्या कहना
© डॉ०प्रतिभा माही (पंचकूला) मो० 8800117246
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सुनीता गर्ग (पंचकुला)
यादों की संदूकची
प्यारी थी वो संदूकची, यादों से वो थी भरी
हर इक कोना जवानी की मीठी बातों से भरी
माँ-बाप की याद भी उसमें थी समाई
वो भी जब पीया संग बजी थी शहनाई
वो यादों भरी संदूकची, मुझको बहुत रुलाती है
पिया जब पास नहीं, तो याद उनकी दिलाती है
खोली जब संदूकची तो, आखें मेरी हो गयी नम
कोई समझे दु:ख मेरा, क्या होता बेवा का गम
अतीत जो इसमें संजोया था वो सब याद आ गया
पायल की छन-छन का शोर, कानों को लुभा गया
संदूकची मे रखी लाल चुनरी, देख मन व्याकुल हुआ
रंग बदल गया चुनरी का कैसा, सुर्ख़ से सफेद हुआ
अतीत की मुस्कराहट की लाली
अब लगती है क्यूँ खाली-खाली
रब से क्या शिकायत करुँ, प्रियतम मेरा खो गया
जीवन-भर की यादें अपनी, संदूकची में ही बो गया
©सुनीता गर्ग (पंचकुला) मो० 8360443109
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गरिमा गर्ग (पंचकूला )
सत्यपथ
जो आग को पानी धारा की तरह पी जाते हैं
उनके चेहरे तेज़ सूरज तरह चमक जाते हैं
चलते हैं वो सदा सत्यपथ पर होकर निडर
कुकर्मो को जड़ से जड़ तक मिटा जाते हैं
ना पनपे बुराई ना उठे गलत कोई भी कदम
अपनी नज़रो से ख़ाक उसी पल कर जाते हैं
सह लेते हैं हर मुश्किल दौर को जो हसँ कर
वही मज़बूत क़दम मज़बूती से उठा पाते हैं
राम अयोधया में रावण न रहता समुंदर पार
राम,रावण भी एक छत के नीचे पाये जाते हैं
कुछ तो मेहनत करते हैं घर के पेड़ उगाने में
कुछ फलों को टहनी सहित तोड़ खा जाते हैं
दहशत देते हैं जो खुद को राजशाही समझ
राजशाही से पहले के वक्त को भूल जाते हैं
फायदा उठाते हैं राजशाही होने का हर पल
वही सभी से पीठ पीछे खूब दुत्कारे जाते हैं
© गरिमा गर्ग (पंचकूला )मो० 7508590705
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कैसा जादू कर डाला
है तेरी बांसुरी की धुन ने हम सब को नचाया
हे श्याम ! साँवले रंग ने कैसा जादू कर डाला
हुए सुध-बुध अपनी खो कर हम तो बेहाल हैं
हर पल कान्हा ! पुकारते बस तेरा ही नाम हैं
हमें परवाह नहीं प्रभु ! क्या ये जग सोचता है
हमारा तुम्हारे संग तो जन्म-जन्म का नाता है
हुआ दीवानगी का हम पर कुछ ऐसा असर है
हर आहट पर निगाहें तुम को ही तलाशती हैं
तुम भी अब आ कर के थाम लो हाथ हमारा
किया तुम पर विश्वास,देखो दिल न तोड़ना
वक्त मिले तो निज चरणों में प्रभु देख लेना
वहीं सजा लिया है हमने अपना आशियाना
©आभा मुकेश साहनी (पंचकूला)मो० 9988560361
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रेणुका चुघ मिढ्ढा (चण्डीगढ़ )
अनकही दास्ताँ
तन्हाईयों के आलम में, अहसास हुऐ बाबस्ता ,
अश्के-मोती दोहरा रहे है ...अनकही दास्ताँ ।
फ़क़त निगाहों से होता था ..दिल का फ़ैसला ,
मयसर नही जानां ...... तो अंजुमन से क्या राब्ता ।
बदला है दौर नहीं वो , जिसमें हो दिलों का सलाम ,
गर निगाहों में ना हो शोख़ियाँ,तो दिलबरी है क्या ।
पत्थरों के शहर में मिल जाये गर दयार -ए -इश्क ,
तमाम उम्र कर दे निसार,फकत ये ज़िन्दगी है क्या ।
लब पे आती है ये दुआ ..... बन के तमन्ना ये मेरी
ज़िंदगी शम्अ की सूरत हो ..... अ ख़ुदाया मेरी।
©रेणुका चुघ मिढ्ढा (चण्डीगढ़ )मो० 8699500077
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©मोनिका कटारिया 'मीनू'
सुख दुःख एक पहेली है
उल्फत का फसाना
जीवन की अनंत यात्रा में
सुख दुःख एक पहेली है
सुख में हम मुसकाते हैं
दुख में नैना बरसाते हैं
पर यह सच पूरा नहीं
सुख में भी आँख भरती है
दुख में होंठ लरजते हैं
सुख भाता है
दुख रुलाता है
सुख दुःख का धूप छांव सा नाता है
कभी आशा कभी निराशा है
कभी दिन है कभी रात है
दोनों एक दूसरे के पूरक
दोनों ज़िंदगी का मान हैं
जिसने एक नहीं पाया
वो दूसरे की अनुभूति से अज्ञान है
सही ग़लत का आभास कराता
झूला है सुख दुःख जीवन का
आगे पीछे हिलोरें खिलाता
सुख के पीछे मत भागना
आज का सुख भी जायेगा
जीवन के झूले में
सुख आयेगा --दुःख आयेगा
दोनों में ही संयम रखना
जीवन आनन्दमय हो जायेगा
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