Friday, 9 July 2021

साहित्य सागर [भाग - 01]


                   साहित्य सागर [भाग - 01]
                      डॉ०प्रतिभा माही (पंचकुला) 
उल्फत का फसाना 
उल्फत का फसाना क्या कहना
उसका नज़राना क्या कहना

रुख़ से पर्दा हट जाए तो
लब का मुस्काना क्या कहना

तू मस्त फ़िज़ाओं सी क़ातिल
पल पल उकसाना क्या कहना

ये पेचोखम भी कम ना थे
अब नैन मिलाना क्या कहना

जब छम छम छनके झांझरिया
कटि का बलखाना क्या कहना

निर्झर झरता सावन 'माही'
अमृत बरसाना क्या कहना

© डॉ०प्रतिभा माही (पंचकूला) मो० 8800117246
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                     सुनीता गर्ग (पंचकुला) 
यादों की संदूकची 

प्यारी थी वो संदूकची, यादों से वो थी भरी
हर इक कोना जवानी की मीठी बातों से भरी  

माँ-बाप की याद भी उसमें थी समाई
वो भी जब पीया संग बजी थी शहनाई

वो यादों भरी संदूकची, मुझको बहुत रुलाती है
पिया जब पास नहीं, तो याद उनकी दिलाती है 

खोली जब संदूकची तो, आखें मेरी हो गयी नम
कोई समझे दु:ख मेरा, क्या होता बेवा का गम

अतीत जो इसमें संजोया था वो सब याद आ गया
पायल की छन-छन का शोर, कानों को लुभा गया

संदूकची मे रखी लाल चुनरी, देख मन व्याकुल हुआ 
रंग बदल गया चुनरी का कैसा, सुर्ख़ से सफेद हुआ

अतीत की मुस्कराहट की लाली 
अब लगती है क्यूँ खाली-खाली

रब से क्या शिकायत करुँ, प्रियतम मेरा खो गया
जीवन-भर की यादें अपनी, संदूकची में ही बो गया

©सुनीता गर्ग (पंचकुला) मो० 8360443109
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                  गरिमा गर्ग (पंचकूला )
सत्यपथ

जो आग को पानी धारा की तरह पी जाते हैं
उनके चेहरे तेज़ सूरज तरह चमक जाते हैं
चलते हैं वो सदा सत्यपथ पर होकर निडर
कुकर्मो को जड़ से जड़ तक मिटा जाते हैं

ना पनपे बुराई ना उठे गलत कोई भी कदम
अपनी नज़रो से ख़ाक उसी पल कर जाते हैं
सह लेते हैं हर मुश्किल दौर को जो हसँ कर
वही मज़बूत क़दम मज़बूती से उठा पाते हैं

राम अयोधया में रावण न रहता समुंदर पार 
राम,रावण भी एक छत के नीचे पाये जाते हैं
कुछ तो मेहनत करते हैं घर के पेड़ उगाने में
कुछ फलों को टहनी सहित तोड़ खा जाते हैं

दहशत देते हैं जो खुद को राजशाही समझ
राजशाही से पहले के वक्त को भूल जाते हैं
फायदा उठाते हैं राजशाही होने का हर पल
वही सभी से पीठ पीछे खूब दुत्कारे जाते हैं

© गरिमा गर्ग (पंचकूला )मो० 7508590705
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                  आभा मुकेश साहनी(पंचकूला)
कैसा जादू कर डाला 

है तेरी बांसुरी की धुन ने हम सब को नचाया 
हे श्याम ! साँवले रंग ने कैसा जादू कर डाला 

हुए सुध-बुध अपनी खो कर हम तो बेहाल हैं 
हर पल कान्हा ! पुकारते बस तेरा ही नाम हैं 

हमें परवाह नहीं प्रभु ! क्या ये जग सोचता है
हमारा तुम्हारे संग तो जन्म-जन्म का नाता है 

हुआ दीवानगी का हम पर कुछ ऐसा असर है 
हर आहट पर निगाहें तुम को ही तलाशती हैं 

तुम भी अब आ कर के थाम लो हाथ हमारा
किया तुम पर विश्वास,देखो दिल न तोड़ना 

वक्त मिले तो निज चरणों में प्रभु देख लेना 
वहीं सजा लिया है हमने अपना आशियाना 

©आभा मुकेश साहनी (पंचकूला)मो० 9988560361
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                रेणुका चुघ मिढ्ढा (चण्डीगढ़ )

अनकही दास्ताँ 

तन्हाईयों के आलम में, अहसास हुऐ बाबस्ता , 
अश्के-मोती दोहरा रहे है ...अनकही दास्ताँ । 

फ़क़त निगाहों से होता था ..दिल का फ़ैसला , 
मयसर नही जानां ...... तो अंजुमन से क्या राब्ता ।

बदला है दौर नहीं वो , जिसमें हो दिलों का सलाम , 
गर निगाहों में ना हो शोख़ियाँ,तो दिलबरी है क्या ।

पत्थरों के शहर में  मिल जाये गर दयार -ए -इश्क , 
तमाम उम्र कर दे निसार,फकत ये ज़िन्दगी है क्या ।

लब पे आती है ये दुआ .....  बन के तमन्ना ये मेरी 
ज़िंदगी शम्अ की सूरत हो .....  अ ख़ुदाया मेरी।

©रेणुका चुघ मिढ्ढा (चण्डीगढ़ )मो० 8699500077 
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                  ©मोनिका कटारिया 'मीनू' 
सुख दुःख एक पहेली है

उल्फत का फसाना 
जीवन की अनंत यात्रा में 
सुख दुःख एक पहेली है
सुख में हम मुसकाते हैं
दुख में नैना बरसाते हैं
पर यह सच पूरा नहीं
सुख में भी आँख भरती है
दुख में होंठ लरजते हैं
सुख भाता है
दुख रुलाता है
सुख दुःख का धूप छांव सा नाता है
कभी आशा कभी निराशा है
कभी दिन है कभी रात है
दोनों एक दूसरे के पूरक
दोनों ज़िंदगी का मान हैं
जिसने एक नहीं पाया
वो दूसरे की अनुभूति से अज्ञान है
सही ग़लत का आभास कराता
झूला है सुख दुःख जीवन का
आगे पीछे हिलोरें खिलाता
सुख के पीछे मत भागना
आज का सुख भी जायेगा
जीवन के झूले में 
सुख आयेगा --दुःख आयेगा
दोनों में ही संयम रखना
जीवन आनन्दमय हो जायेगा
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©मोनिका कटारिया 'मीनू' (मो० 7837131996)

Tuesday, 6 July 2021

कवियों का दिल अदब की महफ़िल" ऑनलाइन वेबिनार 【01】(खुशियों के पल) अखिल भारतीय कविसम्मेलन व मुशायरे(3 जुलाई 2021)

"कवियों का दिल अदब की महफ़िल" ऑनलाइन वेबिनार 【01】(खुशियों के पल) अखिल भारतीय कविसम्मेलन व मुशायरे 
एम० के० साहित्य अकादमी (रजि०) पंचकूला द्वारा दिनांक 03/07/2021 को शाम 6 बजे "कवियों का दिल अदब की महफ़िल" ऑनलाइन वेबिनार 【01】(खुशियों के पल) अखिल भारतीय कविसम्मेलन व मुशायरे का आयोजन  किया गया। जिसमें विभिन्न राज्यों व प्रान्तों से उपस्थित सभी प्रख्यात कलमकारों को Movement Of Happiness Award 2021 से नवाज़ा गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री गणेश दत्त जी (पंचकूला) द्वारा की गई। डॉ० प्रतिभा 'माही' जी ने कार्यक्रम का संचालन किया। 


डॉ० प्रतिभा 'माही' जी ने प्रेम-श्रृंगार से ओतप्रोत ग़ज़ल सुनाई........
दिया एक जलाया सवेरे-सवेरे
कोई पास आया सवेरे-सवेरे 

सजा सेज कलियाँ लगीं गुदगुदाने
हिया से लगाया सवेरे-सवेरे

बतायें क्या तुमको कयामत क्या आयी
लबों पर सजाया सवेरे-सवेरे

नजर से नजर जब मिलाई थी उसने 
नशा सा पिलाया सवेरे-सवेरे

चुराकर जिया जब वो जाने लगा था
 घटा बनके छाया सवेरे-सवेरे

 मैं मदहोश होकर लगी झूमने जब
आ खुद में समाया सवेरे-सवेरे

न जाने क्यूँ माही चढ़ी ये ख़ुमारी 
कदम डगमगाया सवेरे-सवेरे
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©® डॉ प्रतिभा 'माही'
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समारोह में उपस्थित प्रख्यात कवि व शायर 
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1. डॉ० अर्चना गुप्ता जी (मुरादाबाद) ने अपनी मधुर आवाज़ में यादों की फुलवारी महकाई....

सपनों की मोहक वादी में , महक रही हर क्यारी है।
सजी हुई सुन्दर फूलों से, यादों की फुलवारी है।।

यहाँ मिले जो दोस्त तुम्हें हैं ,उनको कभी नहीं खोना।
भौतिकवादी युग में मुश्किल मिलना सच्ची यारी है।।

दुख से मत घबरा जाना तुम,आयेंगे सुख भी इक दिन।
देर सवेर भले हो जाए,आती सबकी बारी है।।

सोचा करती हैं ये नदियां, सागर से जब मिलती हैं।
अच्छे लोगों के होते भी, दुनिया कितनी खारी है।।

मिट जाएगी सारी इज़्ज़त, पल में पूरे जीवन की।
याद सदा रखना अभिमानी, होना भी बीमारी है।।

जिसमें हमने पत्र पुराने ,बड़े सँजोकर रक्खे थे।
आज तलक भी खूब महकती,दिल की वो अलमारी है।।

लिखती यदि सिंगार ‘अर्चना’, लिखती जन की बातें भी।
उसके शब्दों में भावों की , मार बहुत दोधारी है।।
      ©डॉ० अर्चना गुप्ता मुरादाबाद(उत्तर प्रदेश)
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2. श्री आलोक रंजन इन्दौरवी जी (इन्दौर) ने दर्दे  दिल की कहानी कही.....

दर्दे दिल की एक कहानी लिखना है
आया क्यों आंखों में पानी लिखना है

सुनकर उनके दिल का हाल लगा मुझको
गहरी है ये प्रीत दिवानी लिखना है

इश्क मुहब्बत प्यार इसे ही कहते हैं
आई है फिर एक जवानी लिखना है

अपने दिल का राज छुपाके तुम रक्खो
हमको इसकी एक निशानी लिखना है

आंखों के उजले उजले सपनें को अब
रंगों से भरकर अंजानी, लिखना है

प्रेम दिवानों का किस्सा दुहराकर के
मिलने की रुत एक सुहानी लिखना है

सागर  की  गहराई  में  उतरें  रंजन
पागल दिल की है नादानी लिखना है
             ©आलोक रंजन इंदौरवी【इंदौर】
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3. डॉ० शशि तिवारी जी (आगरा) ने करोना आपदा के इस बेढब समय में निस्वार्थ सामाजिक कार्यकर्ताओं के उत्साहवर्धन के लिए अपना यह गीत सुनाया....
ये कर्मवीर ये धर्मवीर,
इनको हम करें प्रणाम।
इनको हम करें प्रणाम।।

प्रेम और निस्वार्थ भाव से कर्तव्यों का पालन
जो करते हैं उनके माथे सदा लगाओ चन्दन
सेवा को ही धर्म समझते
होकर जो निष्काम।
इनको हम करें प्रणाम।।

औरों की सेवा में जिनका सदा लगा है ध्यान
उनके गर्मजोश का कोई हमें नहीं अनुमान
आओ इनका जोश बढ़ायें
ये हैं सुख के धाम।
इनको हम करें प्रणाम।।

भीषण बीमारी के रोगी की जो सेवा करते
उनकी इच्छाशक्ति बढ़ाते कोरोना से लड़ते
लम्बा युद्ध चलेगा फिर भी शुभ होगा परिणाम।
इनको हम‌करें प्रणाम।।
                   प्रो.(डॉ.)शशि तिवारी
           अन्तर्राष्ट्रीय कवयित्री, साहित्यकार, समाजसेवी
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4. डॉ० एल० बी० तिवारी 'अक्स' जी (प्रतापगढ़) ने ग़ज़ल प्रस्तुत की:.....
एक कोने में  पड़ा है , आइना टूटा हुआ !!
वक्त का मारा हुआ है ,आइना टूटा हुआ !!

देखकर बिखरावअपने दिलका शायद इसलिए
कुछ नहींअब बोलता है,आइना टूटा हुआ !!

कितने टुकड़ों में बंटा है दिल हमारा दोस्तो,
दर हकीकत जानता है , आइना टूटा हुआ !!

दूरियाँ  कितनी  बढ़ी  हैं , जानने  के वास्ते,
दिल हमारा  चाहता है , आइना टूटा हुआ !!

होंठ पर मुस्कान-खुशियाँ, इक मुहब्बत के सिवा,
कब कहाँ कुछ मांगता है,आइना टूटा हुआ !!

लोग  डरते  हैं  तभी  आते  नहीं  हैं सामने ,
राज दिल के खोलता है,आइना टूटा हुआ !!

देर तक सजना-संवरना रूबरू जिसके तेरा ,
क्या हुआ?अब पूंछता हैआइना टूटा हुआ !!

आप ने भी खै़रियत पूछी नहीं उसकी कभी,
दर्द  कितने  झेलता है , आइना टूटा हुआ !!

इक न इक दिन उसको भी कीमत चुकानी थी,मगर
सरहदें क्यूँ लांघता है , आइना टूटा हुआ !!

रूठना मनुहार करना हुश्न पर खुद रीझना,
बस यही तो चाहता है आइना टूटा हुआ !!

क्यों समझ आता नहीं बेरह्म ही  दुनिया है ये,
किसके पीछे भागता है, आइना टूटा हुआ !!

फिर जुड़ेंगे दिल से दिल ये खुशगुमानी छोड़िये,
कब दिलों को जोड़ता है , आइना टूटा हुआ !!

आप तन्हाई में जिससे देर तक बतियाते थे,
घर से  वो लापता  है , आइना टूटा हुआ !!

कल तलक जिसको था अपनी हक़ बयानी पर गुमां,
आज कातर दीखता है , आइना टूटा हुआ !!

अक्स चेहरे को नुमाया आइना करता ,मगर
दिल के अन्दर झांकता है,आइना टूटा हुआ !!
                © डॉ एल बी तिवारी 'अक्स'
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5. डॉ० रोशनी किरण जी (मुम्बई) ने अपनी ग़ज़ल के ज़माने की हकीकत को दर्शाया ... .

मुक्तक _मंजरी में दिए बहर पर एक ग़ज़ल _
               1222 / 1222 / 1222 / 1222

उन्हें कैसे बताएं हम हक़ीक़त देख ली उनकी ।
 रखें ईर्ष्या हमेशा ही मोहब्बत देख ली उनकी ।। १ ।।

 कहें अपना , भरम पाले जमाने भर में फिरते हैं _
 वफ़ा उनकी नहीं दिखती शराफत देख ली उनकी ।। २ ।।
 
वफ़ा के वो ख़ुदा बनते जफाओं के जमाने में _
 मोहब्बत उनकी पल _छिन की अदावत देख ली उनकी ।। ३ ।।

भरोसा अब नहीं उनकी मोहब्बत पर हमें यारा _
 जफ़ा ही बस मिली हम को इनायत देख ली उनकी ।। ४ ।।

" किरण " उनकी कभी बातें समझ ना आ सकी हमको _
कहें कुछ भी , करें कुछ भी रवायत देख ली उनकी ।। ५ ।।

____ रोशनी किरण 
        
              ©डॉ० रोशनी किरण (मुम्बई)
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श्री गणेश दत्त जी ने अध्यक्षता करते हुए अपना गीत सुनाया "मन की होली''
     ©श्री गणेश दत्त (पंचकूला)
 
             डॉ०प्रतिभा 'माही' (फाउंडर/चैयरमेन)
         एम० के० साहित्य अकादमी (रजि०) पंचकूला

21वां वार्षिक महोत्सव 2025: राष्ट्रीय हास्य कवि सम्मेलन व सम्मान समारोह:

राष्ट्रीय हास्य कवि सम्मेलन व सम्मान समारोह:               21वां वार्षिक महोत्सव 2025             एम•के• साहित्य...