Wednesday, 11 October 2023

आर्ट दोस्तो


कितने लडके लड़कियां स्मार्ट दोस्तो
सीखली है लूटने की आर्ट दोस्तो
लंबी लंबी फैंकते वो स्वार्थ में सने
बन गये हैं अब खिलौने हार्ट दोस्तो

हो गया है वक्त क्या स्टार्ट दोस्तो
मांगती वो कार बंगला कार्ड दोस्तो
मतलबी रिश्ते सभी, सौदा है प्यार का
बन गया रिश्ता लिविंग का पार्ट दोस्तो

आज के इस दौर में कुछ  नगीने अब भी है
प्यार में डूबे हुए सच्चे सफीने अब भी है

Wednesday, 9 August 2023

राष्ट्रीय हास्य कवि सम्मेलन 29 जुलाई 2023

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक एवं चन्द्रशेखर "आज़ाद" की जयंती के उपलक्ष में..राष्ट्रीय हास्य कवि सम्मेलन 
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              लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक एवं चन्द्रशेखर आज़ाद की जयंती के उपलक्ष में संस्कार भारती, पंचकूला इकाई के सहयोग से "एम० के० साहित्य अकादमी (रजि०) पंचकूला" द्वारा भव्य "राष्ट्रीय हास्य कवि सम्मेलन" का आयोजन दिनांक - 29/07/2023 को  प्रातः  10:30  बजे, भारत विकास परिषद भवन, सैक्टर: 12 ए, पंचकूला के प्रांगण में आयोजित किया गया। 
           श्री नवीन शर्मा, उत्तर संस्कार भारती के प्रभारी की अध्यक्षता  तथा माननीय मुख्य अतिथि - अंतरराष्ट्रीय हास्य कवि राजेश चेतन के सानिध्य में डॉ० तूलिका सेठ, डॉ० कांता वर्मा, डॉ० अनीश गर्ग तथा युवा कवि गौतम शर्मा  ने अपनी प्रस्तुति देकर कार्यक्रम में चार चांद लगा दिए। डॉ० प्रतिभा "माही" ने सभी अतिथियों का स्वागत कर दीप प्रज्ज्वलित करवाया तथा सरस्वती वंदना के साथ कार्यक्रम का आगाज किया।
             युवा कवि गौतम शर्मा  ने सर्वप्रथम अपनी प्रस्तुति देते हुए क्या कहा देखिए..!
    "जो रुक गया, रुकने दिया, जो चल दिया, चलने दिया।
     जो भी हुआ होने दिया, जो टल गया, टलने दिया।।"
            तो दूसरी तरफ डॉ० अनीश गर्ग ने इंकलाब की बात करते हुए अपनी बात रखी और कहा -
     "मैं बेशुमार अपना वतन चाहता हूं ।
       तिरंगे में लिपटा कफन चाहता हूं।।"
            तत्पश्चात डॉ० कांता वर्मा ने अपनी हुंकार से पूरे प्रांगण को हिला दिया और सभी श्रोताओं में जोश का संचार किया वह कहती हैं-
      " मैं वो कवयित्री हूं जो दिल में आग,
         जुबां पर अंगार रखती हूं ।
         शब्दों से भगत सिंह पैदा करती, 
         कलम से इंकलाब लिखती हूं।।"
         और गाजियाबाद से पधारी डॉ० तूलिका सेठ ने अपनी पेशकश में कुछ यूं कहा-
       "बोलो, इतना प्यार लुटाना, किससे सीखे हो।
        बात बात पर, बात बनाना, किससे सीखे हो ।।
        छेड़छाड़ करने पर तो, सब ही चिल्लाते हैं।
        बिना बात के, शोर मचाना, किससे सीखे हो ।।
           डॉ० प्रतिभा "माही" ने हिंदू राष्ट्र के एक होने की बात कही और समाज में वक्त बदलने का संदेश दिया -
"करे राज हिंदुत्व हमारा, 
वक्त बदलना चाहिए।
अगर लाल भारत माँ के हो, 
रक्त उबलना चाहिए।।
विजय विश्व की शपत उठाओ, 
नाज़ करे भारत भूमि।
चले विश्व पर सत्ता अपनी,
तख्त पलटना चाहिए।।"
           और अंत में हास्य कवि राजेश चेतन जी ने सभी को हंसा हंसा कर लोट पोट कर दिया ।  श्रोताओं की तालियों से पूरा हॉल गूंजने लगा। चेतन जी ने अपनी प्रिय कविता "वनवासी राम" से काव्य पाठ को विराम दिया। देखिए उनकी बानगी -
"मात-पिता की आज्ञा का तो, 
केवल एक बहाना था।
मातृभूमि की रक्षा करने, 
प्रभु को वन में जाना था।।"
          कार्यक्रम के अंत में डॉ प्रतिभा "माही" सभी कवियों अतिथियों को उपहार देकर सम्मानित किया । यह समारोह संपूर्ण रूप से सफल रहा, जिसका श्रेय डॉ० प्रतिभा "माही" की मेहनत व संस्कार भारती पंचकूला इकाई के अध्यक्ष सुरेश गोयल मंत्री सतीश अवस्थी तथा संपूर्ण टीम के सहयोग को जाता है।

डॉ० प्रतिभा 'माही'
(संस्थापिका/ अध्यक्ष)
एम० के० साहित्य अकादमी (रजि०) पंचकूला

Monday, 26 June 2023

अखिल भारतीय कवि सम्मेलन 26/05/2023

दिल्लीी में एम०के० साहित्य अकादमी (रजि०) पंचकूला ने करवाया: 
अखिल भारतीय कवि सम्मेलन

            डॉ० प्रतिभा माही ने अब अलग-अलग राज्यों के अलग-अलग शहरों में कवि सम्मेलन करने का बीड़ा उठाया है। दिल्ली, गुरुग्राम, करनाल, नेलोखेड़ी, अम्बाला, पंचकूला, चंडीगढ़ में अनेकानेक कार्यक्रम करने के बाद पुन: दिल्ली की तरफ रुख किया और एम०के० साहित्य अकादमी (रजि०) पंचकूला द्वारा अखिल भारतीय दयानंद सेवाश्रम के वैचारिक क्रांति शिविर में भव्य अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन 26 मई 2023 को शाम 4:30 बजे से 7:00 बजे तक आर्य समाज के किशोर शिविर दिल्ली में किया गया।जोकि श्री योगेन्द्र खट्टर के संयोजन में श्री राजेश चेतन के मार्गदर्शन में हुआ।

           इस समारोह में आमंत्रित प्रख्यात अंतरराष्ट्रीय कवि राजेश चेतन, श्री कलाम भारती, श्री रसिक गुप्ता, श्री राजेश अग्रवाल, श्री मोहित शौर्य व डॉ० प्रतिभा 'माही' ने अपनी प्रस्तुतियां दीं। इस समारोह में क्लास 6 से 12वीं तक के समस्त भारत से लगभग 400 बच्चे उपस्थित रहे तथा कवि सम्मेलन का भरपूर आनंद लिया। सभी कलमकारों को उपहार से नवाजा गया। यह प्रोग्राम देश व देश की नई पीढ़ी को समर्पित है।

         सभी कवियों ने वहां उपस्थित सभी श्रोता बच्चे व बड़ों को हंसाया तथा अपनी संस्कार व संस्कृति से ओतप्रोत प्रेरणादायक कविताओं से सभी आनंदित कर दिया। राजेश अग्रवाल ने मंच का कार्यभार संभाला। सभी कवियों की अलग अलग बानगी देखें...!

           डॉ रसिक गुप्ता ने अपनी कविता में भारत भू के सम्मान की बात कही तथा कुछ चटपटे हास्य के रंग बिखेरे...!
"शब्द-शब्द मेरी कविता का, उनका ही सम्मान करें...!
और स्वयं जन-गण-मन जिनके, कर्मों का गुणगान करें...!
शीश झुकाऊं चरण पखारुँ, पहले हर उस माता के....!
अपने वीर सपूतों को जो ,सीमा पर बलिदान करें....!"

         तो  दूसरी तरफ डॉ० कलाम भारती ने देश भक्ति की बात कही...!
          "शहीदाने हिन्द जैसे वफादार नहीं हैं।
          मुल्क पे जॉ देदें वो किरदार नहीं हैं।
          निज मादरे वतन से जिनको प्यार नहीं है,
          उनसे बड़ा इस मुल्क में गद्दार नहीं हैं।।"
          
          डॉ० प्रतिभा 'माही' ने सरस्वती वंदना से आगाज़ कर वैदिक धर्म पीआर प्रकाश डालते हुए कहा...!
      "आर्य समाज वैदिक धर्म, समझो अद्भुत ज्ञान।
       तर्क तुला पर तौलकर करे धर्म व्याख्यान।।"

          और देशभक्ति पर आधारित कुछ कविताएं कही तथा मां के प्रति एक बेटे के भाव क्या होते हैं अपने एक गीत के माध्यम से बताया: बानगी देखें...

"जो रुलाती भी है, जो हंसाती भी है
प्यार की थपकियां दे सुलाती भी है
कौन है...?कौन है...?कौन है...?कौन है...?
वो तो मां है मेरी..!"


            राजेश चेतन ने अपनी वाणी से मंच को गरिमामय बनाते हुए हंसगुल्लों के फव्वारे छोड़े, जिन्हें सुन सभी बच्चे लोटपोट हो गए। बीच-बीच में संस्कारों की बात भी बच्चों को बताई और अन्त में आर्य समाज वैदिक धर्म की बात कहते हुए अपनी रचना पढ़ी, बानगी देखें.....!
             सच में भारत के रखवाले स्वामी जी...
            वेदों को गुंजाने वाले स्वामी जी...!
             नारी का सम्मान जगाया भारत में ....
             मातृशक्ति के बने शिवाले स्वामी जी...!
           
 
समारोह के अंत में सभी कलमकारों को उपहार देकर नवाजा। समारोह सम्पूर्ण दृष्टि से सफल रहा।
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डॉ० प्रतिभा 'माही'
(फाउंडर/अध्यक्ष)
एम०के० साहित्य अकादमी पंचकूला 
मो०8800117246


Friday, 23 December 2022

स्वतंत्रता के महायज्ञ में साहित्यकारों का योगदान 【14】

        
         स्वतंत्रता आंदोलन भारतीय इतिहास का वह युग है, जो पीड़ा, कड़वाहट, दंभ, आत्मसम्मान, गर्व, गौरव तथा सबसे अधिक शहीदों के लहू को समेटे है। स्वतंत्रता के इस महायज्ञ में समाज के प्रत्येक वर्ग ने अपने-अपने तरीके से बलिदान दिए। इस स्वतंत्रता के युग में साहित्यकार और लेखकों ने भी अपना भरपूर योगदान दिया। अंग्रेजों को भगाने में कलमकारों ने अपनी भूमिका बखूबी निभाई। क्रांतिकारियों से लेकर देश के आम लोगों तक के अंदर लेखकों व कवियों ने अपने शब्दों से जागरूक कर जोश का संचार किया।
 
               प्रेमचंद की 'रंगभूमि', 'कर्मभूमि' उपन्यास हो या भारतेंदु हरिश्चंद्र का 'भारत-दर्शन' नाटक या जयशंकर प्रसाद का 'चंद्रगुप्त'- सभी देशप्रेम की भावना से भरी पड़ी है। 
        
        भारतेंदु हरिश्चंद्र ने जिस आधुनिक युग का प्रारंभ किया, उसकी जड़ें स्वाधीनता आंदोलन में ही थीं। भारतेंदु और भारतेंदु मंडल के साहित्यकारों ने युग   ,, को पद्य और गद्य दोनों में अभिव्यक्ति दी। इसके साथ ही इन साहित्यकारों ने स्वाधीनता संग्राम और सेनानियों की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए भारत के स्वर्णिम अतीत में लोगों की आस्था जगाने का प्रयास किया। वहीं दूसरी ओर उन्होंने अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियों का खुलकर विरोध किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  

       द्विवेदी युग के साहित्यकार महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, श्रीधर पाठक, माखनलाल चतुर्वेदी आदि ने भारतीय स्वाधीनता हेतु अपनी तलवाररूपी कलम को पैना किया तथा स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन कवियों ने जन-जन के भीतर राष्ट्रप्रेम की भावना जगाने तथा उन्हें स्वाधीनता आंदोलन का हिस्सा बनने हेतु प्रेरित किया।

              'भारत-भारती' के रचयिता मैथिलीशरण गुप्त 'राष्ट्रकवि' कहलाए। मैथिलीशरण गुप्त ने भारतवासियों को स्वर्णिम अतीत की याद दिलाते हुए वर्तमान और भविष्य को सुधारने की बात की तथा 'भारत-भारती' में उन्होंने लिखा----
'जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
वह नर नहीं, नर-पशु निरा है और मृतक समान है।।'
 
     
      ऐसे ही पं. श्याम नारायण पांडेय ने महाराणा प्रताप के घोड़े 'चेतक' के लिए 'हल्दी घाटी' में लिखा:-
'रणबीच चौकड़ी भर-भरकर, चेतक बन गया निराला था
राणा प्रताप के घोड़े से, पड़ गया हवा का पाला था
गिरता न कभी चेतक तन पर, राणा प्रताप का कोड़ा था
वह दौड़ रहा अरि मस्तक पर, या आसमान पर घोड़ा था।'


         सुभद्रा कुमारी चौहान की 'झांसी की रानी' कविता को कौन भूल सकता है जिसने अंग्रेजों की चूलें हिलाकर रख दीं। वीर सैनिकों में देशप्रेम का अगाध संचार कर जोश भरने वाली अनूठी कृति आज भी प्रासंगिक है:-

'सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई, फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आजादी की, कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी की रानी थी।'
 
          जयशंकर प्रसाद ने 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' सुमित्रानंदन पंत ने 'ज्योति भूमि, जय भारत देश।' इकबाल ने 'सारे जहां से अच्छा हिदुस्तां हमारा' लिखा। इन सबके अलावा बंकिमचंद्र चटर्जी का देशप्रेम से ओत-प्रोत गीत 'वंदे मातरम्' लिखा।  
             इसी तरह जंगे आजादी में देशभक्ति।से ओत-प्रोत अपनी-अपनी रचनाओं के माध्यम से विशेष भूमिका निभाने वाले साहित्यकारों की एक लंबी सूची है। आज हमारा, हमारे कवियों और साहित्यकारों का यह बड़ा दायित्व बनता है कि हम सब इस देश के बारे में सोचें और उसी परंपरा को जीवित रखें।
     इसी दायित्व को निभाते हुए मां शारदे की कृपा से मेरी कलम ने भी कुछ रचने का प्रयास किया है उसकी बहन कि मैं आपके समक्ष रखना चाहती हूँ :- आजादी

आज़ादी हम ले आये हैं 
आज़ादी का मान करो।
भारत माता का प्यारो अब 
तुम सब मिलकर ध्यान धरो।

आज़ादी की ख़ातिर हमने 
क्या क्या पापड़ बेले हैं।
बेड़ी माँ की कटवाने को 
खून से होली खेले हैं।

याद सदा तुम रखना यारो 
माँ ने बेटों को खोकर।
पौध लगाई है उल्फत की 
वीर शहीदों को बोकर।

शहरा बाँध कफ़न का सिरपर 
सीना ताने रहते वो।
आज भी यारो प्रहरी बनकर 
रोज फ़साने कहते वो।

याद करो वो तीन लाड़ले 
जो शत्रु को खटक गए।
एक न मानी अंग्रेजों की 
हँसते हँसते लटक गए।

भारत माँ की गाँथायें गा 
पीर सभी सह जाते थे।
देख फिरंगी उनके करतब 
भौचक्के रह जाते थे।

ऐसे वीर शहीदों का तुम
शीश झुका सम्मान करो
आज़ादी हम ले आये हैं 
आज़ादी का मान करो।
अब जो झंडा लाल किले पर
लहर लहर लहराता है।
वीर सपूतों की वो हमको
पल पल याद दिलाता है।

लाखों वीर सपूतों की माँ
उन पर बलि बलि जाती है।
देश की ख़ातिर मर मिटने का
उनको सबक पढ़ाती है ।

फौलादी तन देकर उनको
काँधे शस्त्र सजा देती।
भारत माँ की रक्षा करना
उनका फर्ज जता देती।

प्रेम समर्पण भाव सिखाकर
माँ ओं ने जिनको पाला।
भारत माँ की ख़ातिर उनने
सब कुछ अर्पण कर डाला।

सरहद पर जा लड़ते लड़ते
जय भारत की गाते थे
हँसते हँसते नैन पिता के
देश पे बलि बलि जाते थे

याद करो उनकी कुर्वानी
उनके किस्से पान करो।
आज़ादी हम ले आये हैं 
आज़ादी का मान करो।

पुस्तक लोकार्पण एवं अखिल भारतीय कवि सम्मेलन तथा वरिष्ठ नागरिक काव्यपाठ

( वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जयंती के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय साहित्यिक महोत्सव ) पुस्तक लोकार्पण एवं अखिल भारतीय कवि सम्मेलन  तथा वरिष्ठ नाग...