Friday, 23 December 2022

स्वतंत्रता के महायज्ञ में साहित्यकारों का योगदान 【14】

        
         स्वतंत्रता आंदोलन भारतीय इतिहास का वह युग है, जो पीड़ा, कड़वाहट, दंभ, आत्मसम्मान, गर्व, गौरव तथा सबसे अधिक शहीदों के लहू को समेटे है। स्वतंत्रता के इस महायज्ञ में समाज के प्रत्येक वर्ग ने अपने-अपने तरीके से बलिदान दिए। इस स्वतंत्रता के युग में साहित्यकार और लेखकों ने भी अपना भरपूर योगदान दिया। अंग्रेजों को भगाने में कलमकारों ने अपनी भूमिका बखूबी निभाई। क्रांतिकारियों से लेकर देश के आम लोगों तक के अंदर लेखकों व कवियों ने अपने शब्दों से जागरूक कर जोश का संचार किया।
 
               प्रेमचंद की 'रंगभूमि', 'कर्मभूमि' उपन्यास हो या भारतेंदु हरिश्चंद्र का 'भारत-दर्शन' नाटक या जयशंकर प्रसाद का 'चंद्रगुप्त'- सभी देशप्रेम की भावना से भरी पड़ी है। 
        
        भारतेंदु हरिश्चंद्र ने जिस आधुनिक युग का प्रारंभ किया, उसकी जड़ें स्वाधीनता आंदोलन में ही थीं। भारतेंदु और भारतेंदु मंडल के साहित्यकारों ने युग   ,, को पद्य और गद्य दोनों में अभिव्यक्ति दी। इसके साथ ही इन साहित्यकारों ने स्वाधीनता संग्राम और सेनानियों की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए भारत के स्वर्णिम अतीत में लोगों की आस्था जगाने का प्रयास किया। वहीं दूसरी ओर उन्होंने अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियों का खुलकर विरोध किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  

       द्विवेदी युग के साहित्यकार महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, श्रीधर पाठक, माखनलाल चतुर्वेदी आदि ने भारतीय स्वाधीनता हेतु अपनी तलवाररूपी कलम को पैना किया तथा स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन कवियों ने जन-जन के भीतर राष्ट्रप्रेम की भावना जगाने तथा उन्हें स्वाधीनता आंदोलन का हिस्सा बनने हेतु प्रेरित किया।

              'भारत-भारती' के रचयिता मैथिलीशरण गुप्त 'राष्ट्रकवि' कहलाए। मैथिलीशरण गुप्त ने भारतवासियों को स्वर्णिम अतीत की याद दिलाते हुए वर्तमान और भविष्य को सुधारने की बात की तथा 'भारत-भारती' में उन्होंने लिखा----
'जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
वह नर नहीं, नर-पशु निरा है और मृतक समान है।।'
 
     
      ऐसे ही पं. श्याम नारायण पांडेय ने महाराणा प्रताप के घोड़े 'चेतक' के लिए 'हल्दी घाटी' में लिखा:-
'रणबीच चौकड़ी भर-भरकर, चेतक बन गया निराला था
राणा प्रताप के घोड़े से, पड़ गया हवा का पाला था
गिरता न कभी चेतक तन पर, राणा प्रताप का कोड़ा था
वह दौड़ रहा अरि मस्तक पर, या आसमान पर घोड़ा था।'


         सुभद्रा कुमारी चौहान की 'झांसी की रानी' कविता को कौन भूल सकता है जिसने अंग्रेजों की चूलें हिलाकर रख दीं। वीर सैनिकों में देशप्रेम का अगाध संचार कर जोश भरने वाली अनूठी कृति आज भी प्रासंगिक है:-

'सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई, फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आजादी की, कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी की रानी थी।'
 
          जयशंकर प्रसाद ने 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' सुमित्रानंदन पंत ने 'ज्योति भूमि, जय भारत देश।' इकबाल ने 'सारे जहां से अच्छा हिदुस्तां हमारा' लिखा। इन सबके अलावा बंकिमचंद्र चटर्जी का देशप्रेम से ओत-प्रोत गीत 'वंदे मातरम्' लिखा।  
             इसी तरह जंगे आजादी में देशभक्ति।से ओत-प्रोत अपनी-अपनी रचनाओं के माध्यम से विशेष भूमिका निभाने वाले साहित्यकारों की एक लंबी सूची है। आज हमारा, हमारे कवियों और साहित्यकारों का यह बड़ा दायित्व बनता है कि हम सब इस देश के बारे में सोचें और उसी परंपरा को जीवित रखें।
     इसी दायित्व को निभाते हुए मां शारदे की कृपा से मेरी कलम ने भी कुछ रचने का प्रयास किया है उसकी बहन कि मैं आपके समक्ष रखना चाहती हूँ :- आजादी

आज़ादी हम ले आये हैं 
आज़ादी का मान करो।
भारत माता का प्यारो अब 
तुम सब मिलकर ध्यान धरो।

आज़ादी की ख़ातिर हमने 
क्या क्या पापड़ बेले हैं।
बेड़ी माँ की कटवाने को 
खून से होली खेले हैं।

याद सदा तुम रखना यारो 
माँ ने बेटों को खोकर।
पौध लगाई है उल्फत की 
वीर शहीदों को बोकर।

शहरा बाँध कफ़न का सिरपर 
सीना ताने रहते वो।
आज भी यारो प्रहरी बनकर 
रोज फ़साने कहते वो।

याद करो वो तीन लाड़ले 
जो शत्रु को खटक गए।
एक न मानी अंग्रेजों की 
हँसते हँसते लटक गए।

भारत माँ की गाँथायें गा 
पीर सभी सह जाते थे।
देख फिरंगी उनके करतब 
भौचक्के रह जाते थे।

ऐसे वीर शहीदों का तुम
शीश झुका सम्मान करो
आज़ादी हम ले आये हैं 
आज़ादी का मान करो।
अब जो झंडा लाल किले पर
लहर लहर लहराता है।
वीर सपूतों की वो हमको
पल पल याद दिलाता है।

लाखों वीर सपूतों की माँ
उन पर बलि बलि जाती है।
देश की ख़ातिर मर मिटने का
उनको सबक पढ़ाती है ।

फौलादी तन देकर उनको
काँधे शस्त्र सजा देती।
भारत माँ की रक्षा करना
उनका फर्ज जता देती।

प्रेम समर्पण भाव सिखाकर
माँ ओं ने जिनको पाला।
भारत माँ की ख़ातिर उनने
सब कुछ अर्पण कर डाला।

सरहद पर जा लड़ते लड़ते
जय भारत की गाते थे
हँसते हँसते नैन पिता के
देश पे बलि बलि जाते थे

याद करो उनकी कुर्वानी
उनके किस्से पान करो।
आज़ादी हम ले आये हैं 
आज़ादी का मान करो।

No comments:

Post a Comment

21वां वार्षिक महोत्सव 2025: राष्ट्रीय हास्य कवि सम्मेलन व सम्मान समारोह:

राष्ट्रीय हास्य कवि सम्मेलन व सम्मान समारोह:               21वां वार्षिक महोत्सव 2025             एम•के• साहित्य...