Monday, 5 September 2022

इश्क नचाए गली गली सूफी गीत संग्रह 【11】

                        अमूर्त प्रेम का चिन्तन-मनन

           सम्पूर्ण प्रकृति प्रेम को समर्पित है, प्रेम ही इस पूरी दुनियां का आधार है। प्रेम के बिना इस दुनियां का कोई अस्तिव नहीं रहेगा। जब दुनिया मे प्रेम की कमी होने लगेगी तो यह आहिस्ता -आहिस्ता तबाही की ओर अग्रसर होने लगेगी। इसलिए सभी से प्रेम करो, ये प्रेम ही आपको सही रास्ता दिखा सकता है क्योंकि प्रेम ही ईश्वर है।  मेरी अन्तरात्मा द्वारा  अवतरित इस दोहे ने मुझे " प्रेम "  विषय पर लिखने के लिए प्रेरित किया --            
        " गुरु मिला-औ-रब मिला, मिला अनौखा प्यार।
          मैं तो गद-गद हो गई, स्वप्न हुआ साकार।।"

               मैंने ख़ुद को पढ़ना शुरू किया, और यह प्रक्रिया कई सालों तक चलती रही, फिर अपने आस-पास नज़र आने वाले प्रत्येक शख़्स से प्रेम से बात करना आरम्भ किया। ऐसा करने से हमें हर तरफ़ प्रेम ही नज़र आने लगा, हम घण्टों अकेले अपने आप मे हीं खोये रहते और  तब हुआ, हमें सच्चे प्रेम का ज्ञान और पा लिया अपने रब को , अब वो सदा मेरे साथ मेरे पास रहता है। जब मुझे अपने इष्ट का साक्षात्कार हुआ, तब ही आज में प्रेंम का वर्णन कर पा रही हूँ और यह  पंक्तियाँ
मेरे हृदय के उदगार व्यक्त करती हैं देखिए :---
      " है सच्चाई एक यही बस कहती हूँ
        मैं तो बस, अपने कान्हा संग रहती हूँ"
               
              जिस तरह हवा का कोई स्वरूप व आकार नहीं होता, उसी तरह प्रेम का कोई स्वरूप या आकर नहीं होता , प्रेम निराकार ब्रह्म के समान है, अर्थात प्रेम ही रब है, ईश्वर है, ख़ुदा है। प्रेम एक ऐसा रंग है जो एक बार किसी पर चढ़ जाए तो सहज नहीं उतरता, ऐसे प्रेम में स्वार्थ नहीं होता, सिर्फ़ त्याग, बलिदान व समर्पण की भावना होती है, ऐसा प्रेम कभी अपने प्रेम को तकलीफ़ नहीं देता बल्कि अपने प्रेम के लिए मर मिटता है अर्थात ख़ुद क़ुर्बान हो जाता है अपने प्रेम पर आँच नहीं आने देता और ऐसा ही प्रेम अपने प्रेम में विलीन होने के लिए स्वमं को भूल जाता है , उसे सिर्फ़ अपना प्रेम ही नज़र आता है। ऐसा प्रेम अपने अस्तित्व को खोकर अपने इष्ट प्रेम में समाहित हो जाता है । 
              

              जिसने प्रेम को जान लिया और उसे पा लिया, तो समझो उसने रब को पा लिया। प्रेम कहीं भी , कभी भी, किसी भी वस्तु या जीव - जन्तु, जड़ - चेतन इत्यादि से हो जाता है और यही प्रेम जब अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचता है तो रूहानियत में  बदल जाता है , इसी को सूफ़ियाना इश्क़ कहते हैं और ऐसे इश्क़ में प्रेमी झूमने व नाचने लगता है। मस्त मौला, आनन्द में मग्न, पागलों की भाँति अपने इष्ट का नाम लेकर गली-गली बे ख़बर हो घूमने लगता है, उसे समाज की, दुनियां की, लोगों की परवाह नही रहती। ऐसे ही प्रेम को दर्शाती है मेरी पुस्तक "इश्क नचाये गली-गली" ( सूफ़ी गीत व भजन) जो मेरे प्रेम को मेरे इष्ट देव के प्रति दर्शाती है। एक छोटी सी झलक देखें:----
       
      
"श्याम सलौना रूप है इसका , मन मोहन कहलाता है...
चूम लबों से बजा बाँसुरी , सबकी नींद उड़ाता है....
झूम रही है  सारी दुनियां ...
जाने कैसी हवा चली ....
ये इश्क़ नचाए गली गली...… "
              
              ऐसा ही प्रेम मीराबाई ने अपने गिरधर से किया और अन्त में अपने प्रेम में हीं विलीन हो गई। मीराबाई ने कहा :
              "मेरे तो गिरिधर गोपाल, है दूसरो न कोई
              जाके सिर मोर मुकुट, मेरो तो पति सोई"
              
 एक और बानगी देखें :
               "ऐरी मैं तौ प्रेम दीवानी, 
               मेरो दरद न जाणे कोय...
               नभ मण्डल पर सेज पिया की, 
               किस विधि मिलना होय....
               
              ऐसा ही प्रेम संत कबीरदास जी का था, कबीर सूफ़ीवाद के कवि रहे, जिनके निराकार प्रेम की पराकाष्ठा देखिए:--
           "जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।
            सब अँधियारा मिट गया, दीपक देख्या माँहि॥"

कबीर का एक और रंग देखें;---
           "पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
             ढाई आख़र प्रेम का, पढ़ै सु पंडित होय॥"
             

              ऐसा ही प्रेम सन्त बुल्लेशाह, सन्त दादू, रैदास, गुरुनानक, रामभक्त तुलसीदास , कृष्णभक्त सूरदास व रसखान, इत्यादि का भी रहा। जो अपने प्रेम छाप इस दुनियां के दिलों पर छोड़ गए। उनके सूफ़ी गीत व छन्द आज दुनियाँ में गूँजते हैं। दोस्तो मैं भी उनके ही पद कमलों पर चल कर अपने इस जीवन को धन्य बनाने का प्रयास कर रही हूँ।


                प्रेम को व्यक्त करने के लिए दुनियाँ में लोगों ने अपने  मन भावन अलग - अलग तरीकों  को अपनाया है ,किसी ने इन्द्रधनुष के सात  रंगों का प्रयोग करके , कागज़ के धरातल पर अपना प्रेम उड़ेल दिया है, तो किसी ने तानसेन बनकर सरगम के सात सुरों को सँजोकर अपने प्रेम से सभी को सराबोर कर दिया है,  और कहीं किसी ने शब्दों को लड़ियों में पिरोकर कविता-गीत-ग़ज़ल  इत्यादि  के  द्वारा प्रेम का वर्णन किया है। 
           
                प्रेम - इश्क़ - मुहब्बत गर ख़ुदा से हो जाये तो तन मन झूमने लगता है और बिना किसी की चिंता - फिक्र किये मस्त - मौला हो बुल्लेशाह व प्रभु चैतन्य जी की भाँति नाचने लगता है। यही भाव लिए आ रही है मेरी सातवीं पुस्तक "इश्क़ नचाये गली-गली" इसमें सूफ़ी व भक्ति रस के गीतों का समावेश है। सभी गीत अनन्य अलंकारों से अलंकृत हैं तथा प्रेम की पराकाष्ठा को व्यक्त करते हुये दिल की गहराइयों में उतर मन को शीतलता प्रदान करते हैं। जब यह गीत मुझे इतना आनन्दित कर झूमने विवश कर देते हैं तो आपके दिल में उतर आपके मन को भी शान्ति प्रदान करेंगे। ऐसा मुझे विश्वास है, तो लीजिए अपनी यह पुस्तक "इश्क़ नचाये गली-गली" भी आपको  शुभकामनाओं सहित समर्पित करती हूँ।
       
       
डॉ० प्रतिभा 'माही' पंचकूला (हरियाणा)
सूफ़ी कवयित्री, ग़ज़लकार, गीतकार व साहित्यसर्जक 
मो० न० 8800117246


Thursday, 7 April 2022

एम० के० साहित्य अकादमी एवं संस्कार भारती पंचकूला इकाई ने कवियों के साथ मिल किया नव संवत 2079 का अभिनन्दन 03/04/2022

एम० के० साहित्य अकादमी एवं संस्कार भारती पंचकूला इकाई ने कवियों के साथ मिल किया नव संवत 2079 का अभिनन्दन

       एम० के० साहित्य अकादमी (रजि०) पंचकूला एवं संस्कार भारती पंचकूला इकाई के संयुक्त तत्त्वावधान में दिनांक - 03/04/2022 (दिन- रविवार)  को साढ़े 10 बजे प्लाट नम्बर-376 , इंडस्ट्रियल एरिया फेज-1, पंचकूला के प्रांगण में नव संवत 2079 के अभिनन्दन में सबरस कवि दरबार  का आयोजन मुख्य अतिथि डॉ० अनीश गर्ग (प्रख्यात कवि, मुख्य प्रवक्ता व अखिल भारतीय कवि परिषद के अध्यक्ष) तथा विशिष्ट अतिथि श्री हरिन्दर सिन्हा  (प्रख्यात कवि) के सानिध्य में किया गया। श्री सुरेश गोयल ( अध्यक्ष, संस्कार भारती पंचकूला इकाई) ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की तथा डॉ प्रतिभा 'माही' ने मंच का कार्यभार सँभालते हुए माँ सरस्वती की वन्दना कर, सभी अतिथियों द्वारा  दीप प्रज्वलित करवाया । 
          हमारे मुख्य अतिथि डॉ० अनीश गर्ग ने ज़िन्दगी के कुछ अनछुए पहलुओं को समेटते हुये अपने हृदय के उदगार व्यक्त करते हुए क्या कहा गौर फ़रमायें:-
"साहब! फुर्सत होती तो देखता छत के उधड़ते पलस्तर को....! 
'अनीश' को ज़माना हो गया फ़लक का चाँद तक देखे को....!"

       वहीं हमारे विशिष्ट अतिथि श्री हरिन्दर सिन्हा ने कविता का महत्व बताते हुए श्री राम महिमा का गान किया:-
"कविता से ही जीवन है औ कविता से उद्धार है। 
जबतक कविता है जीवन में, भरा पूरा संसार है।।"
          डॉ० प्रतिभा 'माही' ने स्वर्णिम भारत की बात करते हुए क्या कहा देखें:- 
"आज समय है संगम युग का , सतयुग में ले जाएगा।
 स्वर्ग से सुंदर महलों का ये राजा हमें बनाएगा।।
 स्वर्ग नरक है इसी धरा पर, परमपिता ये कहते हैं।
 पहले भी स्वर्णिम था भारत, फिर स्वर्णिम बन जाएगा।।"

        संगीता कुन्द्रा दिल को छू जाने वाली ग़ज़ल सुनाई, बानगी देखिए:- 
"खफा है क्यों बता दे तू, बता कैसी लड़ाई है।
सही जाती नहीं मुझसे, ये अपनी जो जुदाई है।।" 

     कार्यक्रम  में उपस्थित रेनू अब्बी ने नव रात्रि की महिमा का गान किया तो दूसरी तरफ गणेश दत्त जी जीवन का सार बताते हुए अपना गीत ''इस धरा का इस धरा पर सब धरा रह जायेगा" प्रस्तुत किया। वरिष्ठ ग़ज़लकार श्री कमल धवन, विजय सचदेवा व मोहिनी सचदेवा ने भी अपने-अपने विचार बड़ी ही सहजता से रखे। 

     सभी कलमकारों ने अपनी-अपनी रचनाओं से सभी श्रोताओं का मन मोह लिया। आज का यह कवि दरबार सम्पूर्ण दृष्टि से सफल रहा। जिसका पूरा श्रेय संयोजक श्री सतीश अवस्थी को जाता है जो कि संस्कार भारती पंचकूला इकाई के महामंत्री  हैं। एम० के० साहित्य अकादमी संस्था प्रतिमाह इस तरह आयोजनों को करवाती रहती है। कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों ने डॉ० प्रतिभा माही के जज़्बे को सराहा।

डॉ० प्रतिभा 'माही' (संस्थापिका/अध्यक्ष)
एम० के० साहित्य अकादमी (रजि०) पंचकूला

Thursday, 3 March 2022

सबरस कवि दरबार में बिखरे कवियों ने रंग


             एम० के० साहित्य अकादमी (रजि०) पंचकूला द्वारा आज दिनांक - 27/02/2022 (दिन- रविवार) समयः  10:30 A.M. पर  प्लाट नम्बर-376 , इंडस्ट्रियल एरिया फेज-1, पंचकूला के प्रांगण में सबरस कवि दरबार  का आयोजन मुख्य अतिथि ओ०पी०सिहाग तथा विशिष्ट अतिथि डॉ० अनीश गर्ग व श्री अशोक नादिर  के सानिध्य में किया गया। श्री गणेश दत्त ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की तथा डॉ प्रतिभा 'माही' ने मंच का कार्यभार सँभालते हुए माँ सरस्वती की वन्दना कर, दीप प्रज्वलित करवाया ।            

               कार्यक्रम  में उपस्थित गरिमा गर्ग, रेनू अब्बी, नीरू मित्तल, कंचन भल्ला, डेज़ी बेदी, डॉ० अनीश गर्ग, चमन लाल , अशोक नादिर, गणेश दत्त व डॉ० प्रतिभा 'माही'  अपनी-अपनी रचनाओं से सभी श्रोताओं के मन मोह लिया । आज का यह कवि दरबार सम्पूर्ण दृष्टि से सफल रहा। जिसका पूरा श्रेय संयोजक श्री सतीश अवस्थी को जाता है जो कि संस्कार भारती पंचकूला इकाई के महामंत्री  हैं। एम० के० साहित्य अकादमी संस्था प्रतिमाह इस तरह आयोजनों को करवाती रहती है। कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों ने डॉ० प्रतिभा माही के जज़्बे को सराहा।
ग़ज़ल
मैं तुमसे प्यार नहीं करती 
लेकिन इनकार नहीं करती

गुम रहती तेरे ख्वाबों में
पर मैं इक़रार नहीं करती

कहती हूँ अपना हाल-ए-दिल
बस मैं इज़हार नहीं करती

तेरी बज़्म में रहना भाता है
पर ये स्वीकार नही करती

मेरी रग रग *माही* बसता है
उससे तक़रार नहीं करती

© डॉ० प्रतिभा माही 

निकम्मे से हो गए

हम तो यूं ही आए थे किसी काम से महफ़िल में,
देखा जो तुमको बस फिर किसी काम के ना रहे....
बेचैनियां बेकरारियां और उल्फ़तों से हो गई यारियां,
करवटों की कसम फिर कभी हम आराम से ना रहे....

सुना था ग़र इश्क नचाए नाच तो नाचना पड़ता है,
ग़ोया पानी भी यूं मयख़ाने की मय बनके चढ़ता है,
तेरा ज़िक्र तेरी यादों से हो जाता है नशा बोतल का,
तेरे ख़्याल के बाद मुद्दत से यारों की शाम के ना रहे...
हम तो यूं ही आए थे किसी काम से महफ़िल में,
देखा जो तुमको बस फिर किसी काम के ना रहे....

देखते थे हंसते थे दीवानों की दीवानग़ी पर हम कभी,
ये अलग बात है अब देखकर हाल मेरा हंसते हैं सभी,
सौदाईयों की फेरहिस्त में अब शुमार मेरा होने लगा,
'अनीश' अब ना काबिल ना दुआ के ना सलाम के रहे..
हम तो यूं ही आए थे किसी काम से महफ़िल में,
देखा जो तुमको बस फिर किसी काम के ना रहे....

डा० अनीश गर्ग, चंडीगढ़
youme.trust@gmail.com
  ये जो मोहब्बत है

अगर तुमसे नज़रें इनायत न होती 
हमें आपसे फिर मुहब्बत न होती

यूं पलकें जो हमने उठाई ना होती 
कभी भी यूं इजहारे चाहत न होती

तिरी सादगी छू न जाती मुझे गर 
तो यूं हमसे तेरी इबादत न होती 

अगर अश्क़ ना बहते आंखो से मेरे 
तो यादों की तेरी हिफाज़त न होती 

यूं ख़्वाबों में उससे मुलाकात ना हो 
टुटे दिल की मेरे मुरम्मत न होती 

पहन लेते मेरी कलाईयों को तुम 
बिछड़ने की तुझसे अजीयत न होती 

यूं रूहों में गर हम फना ही न होते 
ये इश्क़ ए कहानी ...सलामत न होती

ये बरखा सी यूं ना बरसती जो आंखे 
तो नादां ए दिल में हरारत न होती

यूं मिल जाते हम दोनो इश्के़ वफा संग 
तो दिल की भी कच्ची इमारत न होती

रहे जितना भी तू खफा़ मुझ से दिलबर
ये है इश्क़ ....वरना यूं खिदमत न होती

तिरे ग़म में डूबे है यूं इस क़दर हम 
ना गिरते गर अश्क़ तो राहत न होती

©डेज़ी बेदी जुनेजा , चंडीगढ़

याद करो दिन रात

वादा करो आप से करो देश कुछ हित काम
खुद से किये वादे को खुद याद करो दिन रात

निभाया वादा खुद तो बढ़ेगा जीवन का दाम
जीवन अनमोल हैं करो खुद पर अभिमान

साकार करो ख्यालों को पलकों के मेहमान
खुशमय जीवन खुद का दूसरो को आराम

मिठास घुले जीवन मे भरे सभी दुखते घाव
जीवन बने सुखमय चाहे हो कोई उम्र पड़ाव

मेरा मेरा करते सभी क्यों घर हो या बहार
अंत समय सब रह जायेगा सजे रहेंगे बाजार

कठपुतली बन चलती जिंदगी सुबह और शाम
काम काम का जिंदगी में होता नही कोई विराम

वादा करो खुद जिंदगी से जिओ इसे खुशहाल
जब मिलेगा कोई ऐसा हल नही हुए जब बेज़ान

समय समय का आभाव कहे जीते जी नादान
समय का क्या करोगे बचेंगे नही शरीर मे प्राण

वादा करो आप से करो देश हित कुछ काम
खुद से किये वादे को खुद याद करो दिन रात

गरिमा  गर्ग , पंचकूला

बिटिया
चहकती महकती है मुस्कान बिटिया
मखमली कली सी है नादान बिटिया 

जिसे देख पड़ती कलेजे में ठंडक 
वही मेरा गौरव मेरी शान बिटिया 

लिपट के गले से मिले चैन दिल को 
रहे प्यार निष्ठा से धनवान बिटिया 

सजे सात सुर मुस्कुराए कभी तो
निराली सुरीली मधुर तान बिटिया 

धरा पर उतर के सजाया धरा को
है परियों की रानी सी नादान बिटिया 

धमाचौकड़ी रात दिन जो मचाए 
मुहब्बत ओ' मस्ती का तूफान बिटिया 

बदलती निगाहें जमाने की देखी
चुभे जो नजर हो परेशान बिटिया 

जमाना जो वहशी दरिंदा हो जाता
बनाओ सभी लोग बलवान बिटिया 

नीरू मित्तल 'नीर' पंचकूला
समझौता
जिंदगी तुझ से हर कदम पर समझौता क्यो किया जाये, शौक जीने का है परन्तु इतना भी नहीं,
 कि मर मर कर जिया जाये। 
और चार दिन की जिंदगी है,  
हसके जी लो कोई गम है तो चाय पी लो ।
कंचन भल्ला , चंडीगढ़


*प्रेरणा

*जीवन* में मन खिले उमंगों से,
*प्रेरणा* मिले हम सबको *रंगों से* ।

*लाल* रंग से स्वास्तिक बने,
 संसार में सबका *मंगल* करें।

*पीला*  रंग पितांबर एवं बसंत से,
खिलाया *फूल  * मधुर प्रेम सुगंध*  के।

*नीला* रंग आसमान एवं सागर के,
*प्रेरणा* है जो,*शाश्वत और असीमता* के।

*हरा* रंग चारों तरफ *हरियाली* करें,
मानव के   *सात चक्रों * को *संतुलित* करें।

*संतरी* रंग मन में  * उर्जा* करें,
*देश भक्ति* की भावना भरे।

*जामुनी* रंग "विष* की याद दिलाएं ,
 घृणा, ईर्ष्या , दुष्ट भाव ,*विषाद  तजें*।

 *सात रंगों* से बना* इंद्रधनुष* ,
 नभ में छटा *बिखेरे तरंगों* से।

*सात संगीत* के सुर इसमें घुले,
हमारी *कुंडलियों को जागृत* करें।

*धर्म ,अर्थ ,काम, मोक्ष*,पर नियंत्रण करें,
*सूर्य* के समान हम* स्वर्ण*  बने।

*मिट्टी,, पानी, हवा,उर्जा, आकाश,* सुरक्षित करें,
*आरोग्य,सुगंधिम,ऊर्जावान, अमृत ,खुशहाल* बने।

© रेणु अब्बी'रेणू', चंडीगढ़




Sunday, 23 January 2022

भारत अपना देश, प्यारा प्यारा भारत देश 【ई-पत्रिका)】23/01/2022

         आजादी के 75वें अमृत महोत्सव से स्वर्णिम भारत की ओर अग्रसर इस महा यज्ञ मैं  डॉ० प्रतिभा गुप्ता 'माही' व हमारी संस्था 'एम० के० साहित्य अकादमी (रजि०)पंचकूला' साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक व आध्यात्मिक मूल्यों को समर्पित हो, अपना विशेष योगदान देते हुए, समस्त भारत वासियों , भाइयों व बहनों को ढेर सारी  शुभकामनाएं एवं बधाईयां देती है।
सदस्यों की सूची
1. पुष्पिंदरा चगती भंडारी 
2. डॉ० प्रतिभा 'माही' 
3. गणेश दत्त 
4. सुदेश मोदगिल 'नूर' 
5. सुनीता गर्ग  
6. दीपक शुक्ला 
7. डॉ० प्रज्ञा शारदा 
8. नीरू मित्तल जी
9. ऊषा गर्ग जी
10. रेणु अब्बी जी
11. सरोज चौपड़ा जी
12. संगीता शर्मा कुंद्रा जी
13. नलिनी उप्पल
14. विजय सचदेवा 
15. आभा मुकेश साहनी
16. रेखा मित्तल
17. मोहिनी सचदेवा
18. चन्द्रकला जैन
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1)- बेफिक्र
गर्व है मुझे..
सीमा पर लड़ने वाले
अपने वीर सिपाहियों पे,
मैं बेफिक्र हो कर सोती हूँ ।।

गर्व है मुझे ..
खेतों में पसीना बहाने वाले
अपने वीर कृषकों पे 
मैं पेट भर खाती हूँ ।।                 

©पुष्पिंदरा चगती भंडारी
(पश्चिमी दिल्ली ज़ोन की अध्य्क्ष)
महिला काव्य मंच, दिल्ली
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2)-शत शत नमन शहीदों को
करता भारत शीश झुकाकर , शत शत नमन शहीदों को।
अश्क़ स्वरूपी सुमन चढ़ाकर, शत शत नमन शहीदों को।।

पुलवामा की इस घटना ने, दिल को चकना चूर किया।
भारत के हर शख़्स को इसने, उठने को मजबूर किया।।
बच्चे बूढ़े नर नारी सब , उतर पड़े हैं सड़कों पर।
मोदी जी अब कदम उठाओ , लफ़्ज़ यही हैं होठों पर।।
माता के हृदय से चिपके, देखो लाल सिसकते है।
बहना के पथराये नैना, वीर का रस्ता तकते हैं।।
वीर शहीदों की रूह पूछे , कुछ तो बोलो मोदी जी।
उबल रहा है लहू हमारा , मुख तो खोलो मोदी जी।।
आतंकी का खौफ बताओं, कब तक राज करेगा अब।
घाव लगे हैं जो ह्रदय पर, उनको कौन भरेगा अब।।
बतलाओ क्या उत्तर दे हम, अपने वीर शहीदों को।
करता भारत शीश झुकाकर, शत शत नमन शहीदों को।।

शस्त्र सजाकर बैठे हैं बस, एक इशारा दे दो तुम।
आज मिला देंगे माटी में, बैठ नज़ारा देखो तुम।।
अब सहन नहीं होती हमसे, ये पाकिस्तान की गद्दारी।
पाल रहा जो आतंकी को, करता छुपकर गोलाबारी।।
आदेश तुम्हारा मिल जाये, तो डंका आज बजा देंगे।
कमजोर न समझें भारत को, ये दुनिया को समझा देंगे।।
शीश हिलाकर पी०एम० ने फिर, सेना को आदेश दिया।
ब्रह्ममहूर्त में पवनदूत को, बालकोट में भेज दिया।।
बोले जाओ आग लगा दो, दुश्मन के तुम डेरों पर।
लौटोगे है पूर्ण भरोसा, मुझको अपने शेरों पर।।
हाथ जोड़कर बोले 'माही', शत शत नमन शहीदों को।
करता भारत शीश झुकाकर, शत शत नमन शहीदों को।।
©डॉ०प्रतिभा 'माही' पंचकूला
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3)- भारत  सबसे न्यारा है
मेरा भारत सबसे सुंदर, मेरा भारत बने महान ।
जाती धर्म पीछे रह जाएँ, देश प्रेम का हो गुणगान ।।

वीरों की एक ही भाषा है , वीरों का एक ही नारा  है ।
मर जाएंगे देश के ख़ातिर , दिल देश पे वारा है ।।

अपने देश की रक्षा करना, लक्ष्य आज हमारा है ।
दुनियाँ भर के देशों में भारत  सबसे न्यारा है।।

स्वतंत्र हुए कई वर्ष हुए,भारत अब बन रहा महान।
देश प्रेम से, भरलें खुद को, रखें इसकी पूरी शान।।

वर्षगाँठ मनाते आए हैं, हर्षित होते हर साल।
अपनी ग़लतियों से हम सीखें,ना खड़ा हो कोई बवाल।।

सरल नहीं है देश पे मिटना,फिर भी वो दिल रखता है ।
चैन की नींद हम सो पाएँ, दिन रान वो मरता है।।

रोज़ रोज़ हो रहे शहीद, वीर गति वो पातें हैं।
सगे सम्बन्धी उनको खोकर हृदय विषाद को पातें हैं ।।

हम सब का है फ़र्ज़ यही हर उस घर का रखें ध्यान ।
जिस घर से वीर सैनिक भारत माँ पर हो क़ुर्बान ।।
©गणेश दत्त ( पंचकूला, हरियाणा)
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4)- शहीदों को सलाम
भारत माँ का हर इक ज़र्रा, हमको जान से प्यारा है।
तन मन धन क़ुर्बां इसपे, यह हिन्दुस्तान हमारा है।।

आज़ादी पाने की लिए,वीरों  ने खुद को वारा है।
आज़ादी की रक्षा करना, पहला फ़र्ज़ हमारा है।।

भारत माँ की ज़ंजीरों को जिन वीरों ने खोला ।
आज़ादी को उन वीरों ने अपनी जान से तोला ।।

क़त्ल करके अपने दिल को,लिख गये खूं से कहानी।
यह आज़ादी है उन्हीं वीरों की हम पर मेहरबानी।।

माँ की आज़ादी की ख़ातिर जान अपनी सबने दी।
और जान के बदले में आज़ादी वापिस ले ली।।

आओ शीश झुकाये उनको,करें उनका गुणगान।
अपना तिरंगा झंडा तो है उन वीरों का निशान।।

पाई विरासत में आज़ादी, क़ीमत इसकी बतायें।
आने वाली पीढ़ी को अब सारा हाल सुनायें।।

भगतसिंह ने फाँसी चढ़ के दिये थे अपने प्राण।
लाला जी भी लाठियाँ खाकर हुये थे लहुलूहान।।

चंद्रशेखर आज़ाद ने खुद पर खुद ही गोली चलाई।
उनको फ़िरंगी छू ना ले,यह क़सम उन्होंने थी खाई।।

ऐसे ऐसे वीरों की हम दोहराये आज कहानी।
शेर सपूत थे भारत माँ के, वो सब थे बड़े स्वाभिमानी।।

सुनो वतन के नौजवानों माँ ने तुम्हें पुकारा है।
भारत माँ की रक्षा करना पहला फ़र्ज़ तुम्हारा है।।

तुमने विरासत में पाई, आज़ादी इसे सम्भालों।
मज़हब के झगड़ों को छोड़ो, सबको गले लगा लो।।

क़सम तुम्हें आज़ादी की, ना भूलना तुम यह कहानी।
याद सदा रखना हमको, कह गये सभी बलिदानी।।
©सुदेश मोदगिल ‘नूर’
पंचकूला ( हरियाना)
9779794008
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5)- भारत के वीर जवानों 
भारत के वीर जवानों पर, हम सब को नाज़ है।
जान लुटाने को तैयार हरदम, ऐसे वो जाँबाज़ हैं।।

प्रहरी बन डटे सीमाओं पर, रात-दिन का न होश है।
दुश्मन पर काल बन कर टूटें, रगों में ऐसा जोश है।।

देश की आन-बान हेतु, जान अपनी लुटा जाते हैं।
देश नतमस्तक होता जब तिरंगे में लिपट आते हैं।।

माँ रोती है देख लाल को, बीवी भी बेहाल होती है।
बहन की राखी की लाज, जब देश के नाम होती है।।

पिता की आँख भी, कभी-कभी छुप कर रोती है।
देख बेटे की शहादत, उसकी छाती चौड़ी होती है।।

होता जब जंग का ऐलान, दुश्मन फिर ख़ौफ़ खाता है।
होता हर भारतीय का सर ऊँचा तिरंगा जब लहराता है।।
©सुनीता गर्ग 
पंचकुला  ( हरियाणा) मो० 8360443109
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6)- राष्ट्र गौरव
मैं यहाँ हाज़िर नहीं हूँ सिर्फ हंगामा लिए।
राष्ट्र हित थामी कलम वो कलम चलनी चाहिए।।

बुझ चुकी जो बेहतरी की आग बीते सालों में।
हो कहीं शुरुआत लेकिन आग जलनी चाहिए।।

जो करें भारत सनातन के गौरव की प्रतिष्ठा।
राष्ट्र हित उनकी फिजा चहुँ ओर बननी चाहिए।।

कवि और कविता नहीं हैं, मात्र मन रंजन यहाँ।
सत्य की भी लेखनी दमदार चलनी चाहिए।।

राष्ट्र हित जीवन समर्पित आज जिसका देश में।
आगे बढ़ कर सबको उसका साथ देना चाहिए।।

राष्ट्र गौरव के लिए जो भिड़ गया हो विश्व से।
साथ उसका एक बार फिर निभाना चाहिए।।
कवि दीपक शुक्ल
(संगरूर ,पंजाब)
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7)-अनेकता में एकता , हिन्द की विशेषता
एकता चिल्लाई इक़ दिन, सुनो-सुनो मेरी बात,
नहीं रहोगे मिलजुल कर, तो शत्रु देंगे मात।

मैं तो राष्ट्र हितैषी हूँ, सुनो सभी मेरी बात,
यदि करोगे भक्ति मेरी, सदा मैं दूँगी साथ।

राष्ट्र के हर मानव से कह दो, करे मेरा सम्मान,
मैं जिताऊँगी तुम्हें, इस बात का रखना ध्यान।

राष्ट्र के हित के लिए, मुझे कवच बनाओ,
साधना से मेरी तुम, मुझको साध जाओ।

एकता में ही संबल है, 
जिस देश में नहीं, वो निर्बल है।
ये कैसी आज़ादी है, हर ओर बर्बादी है,
जात और पात भी फैली है, छुआ-छूत भी बाकी है।।

एकता है राष्ट्र का आधार, 
न थोपो उस पर साम्प्रदायिक विचार।
एकता है अंत दुखों का,
इसमें ही कल्याण अपनों का।
अनेकता में एकता है, मेरे भारत की विशेषता।।

यही पाठ हमने पढ़ा, और सबको पढ़ाया है,
किंतु प्रत्यक्ष में इसका, कहीं न दर्शन पाया है।

इतिहास भी गवाह है, शक्ति मेरी अपार है,
एकता ही करेगी, राष्ट्र का बेड़ा पार है।
©डॉ. प्रज्ञा शारदा
( चंडीगढ़ ) मो०9815001467
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8)- मातृभूमि
जहाँ जन है जहाँ गण है वहीं भारत का मन है।
मातृभूमि के पावन चरणों में मेरा कोटि नमन है।।

हरित धरा है नील-गगन है पँछी गुंजन कलरव है।
भरे वृक्षों से झरते झरनों से दृश्य ये अभिनव है।
करते क्रीड़ा मृग विहग संग सिंह सम्भव है।
है समर्पित पावन भूमि को मेरा हर पल छन है।।
मातृभूमि के पावन चरणों में मेरा कोटि नमन है।।

गौतम बुद्ध और महावीर की पावन ये धरा है।
राम मर्यादा कृष्ण की लीला से जीवन भरा है।
तुलसी मीरा रहीम कबीर वाणी का अमृत झरा है।
दयानन्द विवेकानंद की वाणी का नन्दन है।।
मातृभूमि के पावन चरणों में मेरा कोटि नमन है।।

ज्ञान वेद का उपनिषदों का जीवन में उतरा है।
गीता के उपदेशों से हर कर्म सार खरा है।
आयुर्वेद योग ध्यान में दर्शन अध्यात्म भरा है।
निर्मल प्रेम धारा में लिपटा जन मानस पावन है ।।
मातृभूमि के पावन चरणों में मेरा कोटि नमन है।।
©नीरू मित्तल 'नीर'
(पंचकूला, हरियाणा)
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9)-आख़िर  कुर्बानियां रंग लाईं
एक बड़ी प्रसिद्ध कहावत है, 
आग लेने आई, बन बैठी घरवाली। 
ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी, 
ऐसी ही चाल थी चाली।। 

करने लगे व्यापार देश को, 
खोखला था उन्होंने बनाया। 
कच्चा माल जहाज़ भर-भर कर, 
मुफ़्त में  अपने देश पहुंचाया।। 

फूट डालो और राज करो, 
कूटनीति यह उन्होंने अपनाई। 
एक एक कर के सभी रियासतें, 
अपने राज्य में थीं मिलाईं।। 

खुराफाती दिमाग़ कलाईव का, 
    हर हथकंडा अपनाया। 
राजाओं को आपस में लड़ाकर, 
कानून अपने अनुसार बनाया।। 

रानी लक्ष्मी बाई, नाना साहिब, 
मंगल पांडे जैसे अनेकों वीर। 
सत्तावन में शहीद हो गए, 
खींच गए आगे पक्की लकीर।। 

आज़ादी की चिंगारी जो भड़की, 
आगे चलकर बनी मशाल। 
भगत, राजगुरू, सुखदेव ने, 
उसमें और भी तेल दिया डाल।। 

असैंबली में बम फेंका वीरों ने, 
शायद खुलें अंग्रेजों के कान बहरे। 
न पुलिस के पकड़े जाने का डर, 
उसी जगह पर खड़े रहे।। 

लाला जी की मृत्यु का लिया बदला, 
सांडर्स को जब मार गिराया। 
लंडन जाकर ऊधम सिंह ने, 
उड्वायर को गोली से उड़ाया।। 

चला मुक्कदमा, भगत, राजगुरू, सुखदेव, 
तीनों को फांसी  गई सुनाई। 
वतन पर मर मिटने को तैयार, 
चंद्रशेखर, सराभा ने बलि चढ़ाई।। 

सर-फरोशी की चाहत में उतावले, 
लाखों देश भक्तों को दिया पैगाम। 
गुलामी की बेड़ियाँ काटनी भारत माता की, 
बस आज़ाद  हो मेरा देश, 
जो अभी तक है गुलाम।। 

वक्त से पहले दे दी फांसी, 
अंग्रेज़ी सरकार अंदर से डर गई थी। 
कहीं जन्म न लें ले हज़ारों भगत सिंह, 
यही सोच उनकी आत्मा मर गई थी।। 

आख़िर  कुर्बानियां रंग लाईं, 
देश मेरे को मिली आज़ादी। 
रखना इसे अब तुम्हीं संभाल कर,  
बच्चे- बच्चे के मन में जोत जला दी।। 
 ©उषा गर्ग 
(सैक्टर 15 पंचकूला ,हरियाणा)
मोबाइल नं 9417869922
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10)- श्रद्धांजलि शहीदों को
अमर शहीदों का देश मेरा,
भक्त सिंह, राजगुरु सहदेव का डेरा।

कैसे हंस-हंस कर तुम ने दी कुर्बानी,
तुमने देश आजाद करवाने की ठानी ।

चूम लिए फांसी के फंदे,
इश्क था तुम्हारा रूहानी।

कतरा कतरा लहू का बहाया,
भारत के देश को आजाद कराया।

नवयुग के सृजन सपनों से,
नई उमंगों से देश सजाया।

आज भी मातृभूमि की रक्षा में
कितने सैनिक शहीद हो गए।

आज भी अपने देश की खातिर,
कितने लाल कुर्बान हो गए।

बौछार गोलियों की सरहद पर,
वीर सेनानी पराक्रमी, है सहते।

शत-शत नमन उन वीरों को,
जिन्होंने दी देश पर दी कुर्बानी।

अमर जवान ज्योति विलीन तेरा,
अमर चक्र लौ से जगा देश मेरा।

नतमस्तक, भावविभोर मन मेरा,
सजल नयन, श्रद्धांजलि दे दिल मेरा।
©रेणु अब्बी "रेणू"
चंडीगढ़
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11)- धन्य धन्य ये भारत भूमि          
धन्य धन्य ये भारत भूमि, जहां महावीर उपजाए जाते है।
देश की खातिर प्राण गँवाने, को जो तत्पर हो जाते है।।

बचपन से ही भारत मां को हम तो शीश झुकाते हैं।
मात-पिता घरवार छोड़ कर ,सेना में नाम लिखाते हैं।।

अपनी मां को भूल भालकर , देश पर बलि-बलि जाते हैं।
छाती पर गोली खाने में , कभी भी नहीं संकुचाते है।।

सुभाष,लाजपत,पद्माबाई ने, दुश्मन की रेल बनाई थी
महाराणा प्रताप,लक्ष्मीबाई ने ख़ूनी नदी बहाई थी

मरते-मरते  भारत माँ जी  जय का नारा गाते हैं।
रक्त रंजित हो-होकर वो लिपट तिरंगा आते हैं।।

बड़े धन्य हैं माता पिता वो, जो हँसते-हँसते सब सह जाते।
एक हुआ न्योछावर तो फिर, दूजे को सेना में भिजवाते।

धन्य धन्य ये भारत भूमि, जहां महावीर उपजाए जाते है।
देश की खातिर प्राण गँवाने, को जो तत्पर हो जाते है।।
© सरोज चोपड़ा
पंचकूला(हरियाणा)
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12)-जा बेटा तू सीमा पर
जा बेटा तू सीमा पर, मैं बैठ प्रार्थना करता हूँ।
तेरे लंबे जीवन की खातिर, मैं आराधना करता हूँ।।

दुश्मनों के खून से, भारत वंदना करना तुम।
बढ़ते जाना आगे आगे, झंडा ऊँचा रखना तुम।।

दुश्मन को पीठ दिखाना मत, आगे बढ़ते जाना तुम।.    अपना फर्ज भुलाना मत, झंडे कस मान बचाना तुम।।

जो प्राण गए तो गम ना करना, मैं खुद को संभाल लूँगा।
तेरी याद मे सीना चौड़ा करके, उमर अपनी निकाल लूँगा।

तुझ को किया समर्पित देश को,अब आँसू नहीं बहाऊँगा।
तू भी शपथ ले भारत माँ की, मर कर भी फर्ज निभाऊँगा।
©संगीता शर्मा कुंद्रा, चंडीगढ़

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13)- यह हम सबका हिंदुस्तान है 
आया दिन फिर आज़ादी का 
क़ुर्बान हुए जिसे पाने को
कितने वीर ना जाने सब
झंडा ऊँचा भारत माँ का लहराया था तब

सब कुछ भूल
देश की आन बचाने आए थे जो 
दम लिया आज़ादी दिलवा  कर
सच्चे देशभक्त थे वो 

सीना ठोक खड़े थे
दुश्मन को ललकारा था, फंदा चूम स्वीकार था 
दिया अपना बलिदान था
बढाया भारत माँ का मान था

माता-पिता,बहिन-भाई,
पत्नी -बच्चे
सबसे ऊपर चाहा देश को
देशभक्त थे वो सच्चे

आयी जब जान देने की बारी 
लगा कर अपना सब दाँव पर
एक - एक ने निभाया फ़र्ज़
रखा पाँव इंकलाब की आग पर

हंसते -हंसते शहीद हो गए
सम्भाल रखना अपने देश को ,कह गए
आज देश का जो हाल है 
हम में से हर एक शख़्स इसका ज़िम्मेवार है 

क्या चुका पायेंगे शहीदों के बलिदानों का 
हम थोड़ा सा भी कर्ज़,
या ,दिलाना होगा हर एक को याद 
आज अपना फ़र्ज़

देशभक्ति ना जाने 
कहाँ खो गयी
क्या देश की जवाबदेही 
सिर्फ़ कुछ लोगों की हो गयी?

देते आज भी जान सरहद पर डटे सिपाही  हैं
इस धरती के लाल तो तुम भी हो
क्या तुमने कोई ज़िम्मेवारी निभायी है?
आज़ादी तो तुमने भी पायी है 

सवाल करोगे जब तुम यह 
अपने ज़मीर से,
आइने से आँख ना मिला पाओगे
देखो ,बेशक क़रीब से 

पाओगे अक्स हर  शहीद का ,
अपने में तुम खुद
क्या तभी तुम्हें आएगा याद 
लेना अपने देश की सुध?

कब जागोगे ?
कब समझोगे
इसके लिए तो बनती
हर किसी की जवाबदेही है 

मत भूलो 
भारत माता 
खून वीरों का 
देख बहुत रोयी है 

कण -कण  में बस्ती इसमें
शहीदों की गाथा है
यह धरती मेरे देश की है 
यह मेरी भारत माता है

हर नागरिक रखे
जज़्बा एक सिपाही  का जब
सच्ची श्रद्धांजलि होगी हमारे 
शहीदों को बस  तब 

सिर्फ़ मेरा नहीं, 
तेरा भी है 
यह हमारा देश महान है
यह हम सबका हिंदुस्तान है 
© नलिनीउप्पल
डेराबस्सी ,पंजाब  
e mail-  nalini.poeticvein@gmail.com
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14)-26 जनवरी
यूं ही नहीं हम 26 जनवरी को इतनी शान से मनाते हैं,
हम विश्व को अपनी ताकत और एकता का प्रमाण दिखाते हैं।।

 यूं ही नहीं हम जगह-जगह तिरंगा लहराते हैं,
और एकजुट होकर देश भक्ति के गीत गाते हैं।।

 हमारे पूर्वजों की कुर्बानियों को भी गिनवाते हैं,
और शहीदों की वीर गाथाएं भी सुनाते हैं।।

भले ही मतभेद हो हमारे अंदर बहुत सारे,
पर जब देश की बात हो तो हम एक हो जाते हैं।।

असली मकसद तो हममें देश प्रेम और देशभक्ति की भावना जगाना है,
और भावी पीढ़ी को आजादी की कीमत बतलाना है।।

 भारत का इतिहास तड़पते हाथों से खून से लिखा गया है,
 हमारे पूर्वजों ने असंख्य अत्याचार सह कर स्वतंत्रता का फल पाया है ।।

कोई गद्दारी ना करें तो भारत को विश्व में कोई हरा नहीं सकता,
किसी भी क्षेत्र में भारत की बराबरी कोई देश पा नहीं सकता।।

मुझे गर्व है अपने देश की अखंडता एवं एकता पर,
 खून की होलियां खेल सकते हैं जरूरत पड़ने पर ।।

अभी तो हम शांत समंदर है वक्त आने पर तूफान बन कर दिखा देंगे,
कोई हमारे देश की ओर नजर उठाकर देखेगा तो उसका नामोनिशान मिटा देंगे।।
©विजय सचदेवा
(पंचकूला, हरियाणा) मो०9871097849
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15)-सैनिक की अभिलाषा
तिरंगे में ग़र लिपटा आऊँ, तुम कभी आँसू बहाना न।
मेरी शहादत पर तुम कहीं, अपने गम को दिखाना न।।

मुझे भारत की मिट्टी का, माँ, तूँ तिलक लगा देना।
ये वीरों की ही धरती है, दुनियाँ को बतला देना।।

मेरा ईमान ही है तिरंगा, मेरी ही शान है तिरंगा।
सरहद का मैं रखवाला, सैनिक हूँ मैं मतवाला।।

सिंह सा ललकारूँ शत्रु को ,देश का वीर सपूत हूँ मैं ।
व्यर्थ जीवन न जाये मेरा ,इक ऐसी अलख जगा देना ।।

वन्दे मातरम् का माँ, तब उद्घोष करूँगा मैं ।
शत्रु के छक्के छुड़ाऊँगा , ऐसा प्रहार करूँगा मैं।।

दफ़्न कर दूँगा हर कोशिश,लहू दुश्मन का बहाऊँगा।
चीर दूँगा उस सीने को, जो माँ पर आँख उठाएगा।।

माँ का क़र्ज़ चुका पाऊँ , देश का परचम लहराऊँ ।
दो आशीष मुझे माता , उठे तेरा सर गर्व से सदा ।।

वतन ही मेरी आरज़ू, वतन ही मेरी आबरू।
वतन पे जाँ फ़िदा करना , यही है मेरी अभिलाषा ।।
©आभा मुकेश साहनी 
पंचकूला
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16)-थाली के लाल
कोटि-कोटि नमन है ,देश के पहरेदारो को ,
युगों युगों तक करेगा स्मरण ,वतन के रखवालो को।

सर्द बर्फीली वादियों में ,सीना तान खड़े तुम ,
प्रहरी हो देश के ,भरोसा तान खड़े तुम।

आंखों में आंसू ,अंबर में कहीं खो गए,
विश्वासघात करा दुश्मन ने, चिर निद्रा में सो गए। 

दे कुर्बानी  देश के लिए ,कुछ वीर अमर हो गए,
इतिहास बना पन्नों में  , कुछ पंछी मुक्त हो गए।

देश सेवा ही धर्म तुम्हारा, सदा करते यही ललकार ,
भारत माता की जय होगी ,यही तुम्हारी पुकार ।

रोई धरती, रोई दिशाएं,आसमान भी रोया होगा,
नम आंखों से वीरों की ,शहादत को धोया होगा।

अनगिनत मांओ के सीने में‌ ,शोला दहला होगा,
 बच्चों ने अपने सिर से , साया खोया होगा ।

सुहागिनों का मिटा सिंदूर ,बहनों का बिछड़ा प्यार ,
अपने साथियों को भी, सदा के लिए खोया होगा।

जलती चिताओं में शहीद, सदा के लिए सो गए,
 धरती के कुछ लाल ,सदा के लिए अमर हो गए।
 © रेखा मित्तल, स्वरचित
      चंडीगढ़
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17)- हमारे वीर जवान 
देश की सेवा में जो दिन रात है लगे हुए,
अपनी जान की परवाह ना कर, 
सीमाओं पर है डटे हुए।

जमा देने वाली ठंड हो या जला देने वाली गर्मी हो,
दिन रात दुश्मन की गोलियों के बीच रहते हैं, 
जो बिना डरे हए।

जो मौत के मुंह में रहकर भी देश पर आंच ना आने देते हैं,
विपरीत परिस्थितियों में भी असंभव को संभव बना देते हैं।

देश के अंदर भी जब-जब विपदा है आई,
अपनी जान पर खेलकर, 
इन वीरों ने हमारी जान है बचाई।

इतिहास नहीं भूलेगा उनको जो मर कर भी नहीं मरते हैं,
ऐसे वीर जवानों को हम दिल से नमन करते हैं।
©मोहनी सचदेवा ,
पंचकूला हरियाणा
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18)-गणतंत्र की पावन बेला
गणतंत्र की जड़े गहरी है,
संविधान की नींव पुख्ता,
धर्म, स्त्री-पुरुष, जात-पात से, परिभाषित नहीं अधिकार हमारे,
कथनी-करनी का अंतर मिटे तो,
जागे, धन्य-धन्य भाग्य हमारे!

जल-जंगल-जमीन से बेदखल,
आदिवासी भाई हमारे, आत्महत्या पर,
 मजबूर किसानो की पीढ़ी,
भ्रूणों में दम तोड़ती कन्याएं,
जनम लें भी तो 
झपटनें को तैयार,
भेड़ियों सी लोलुप निगाहें

सीढ़ियां चांद-मंगल तक जा पहुंची,
आदमी-आदमी  के बीच दूरी बढ़ी,
तर्क नई दिशाएं छू रहा,
प्रश्न उठ-उठ, तलाशते है उत्तर.

जीवन मूल्य विकसित करने में,
नाकाम हमारी शिक्षा,
नेताओं-आंदोलनों से टूटा भ्रम,
मोहरा बनाती राजनीति से,
जन-जन का हुआ मोहभंग!

आंखों में सपने,
कदमों में संकल्पों का साहस,
बाजुओं में चुनौतियों से लड़ने का जोर,
स्वयं को तौलने की सचाई,
सही अक्स देखने की ललक,
झूठ का आवरण हटा,
सच कहनेका दम है.

परिश्रम, सचाई, ओज, ऊर्जा के,
ताने-बाने से,
भविष्य बुननेका वक्त आ गया है,
आदर्शों की दुहाई, नैतिकता के नारे,
देश नहीं संवारते,
कीचड़ में कमल बन
खिलने की बेला है,
कल और आज के बीच,
सार्थक पुल बनाने, 
गणतंत्र को मजबूत करने,
युवा कदम आगे बढ़ आये है,
अब नई पीढ़ी को लड़ना है
न्याय की लड़ाई! 
©चंद्रकला जैन, वैनकूवर (कनाडा)
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एम० के० साहित्य अकादमी (रजि०) पंचकूला' दिनांक 23/01/2022 को प्रातः 11 बजे ऑनलाइल वेबिनार का आयोजन किया गया।  इस अवसर पर देशभक्ति से ओतप्रोत रचनाओं के साथ सभी सदस्य आमंत्रित हुए व काव्यपाठ किया। 
               इस कार्यक्रम में हमारी मुख्य अतिथि : श्रीमती पुष्पिंदरा चगती भंडारी जी (पश्चिमी दिल्ली ज़ोन की अध्यक्ष, महिला काव्य मंच, दिल्ली) रहीं तथा अध्यक्षता श्रीमती सुदेश 'नूर' मुदगिल जी, हमारी वरिश्ठ साहित्यकारा ने की। 
            इस महा यज्ञ में हम डॉ० प्रतिभा गुप्ता 'माही' व हमारी संस्था 'एम० के० साहित्य अकादमी (रजि०) पंचकूला' साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक व आध्यात्मिक मूल्यों को समर्पित हो, अपना विशेष योगदान देते हुए समस्त भारत वासियों , भाइयों व बहनों को ढेर सारी  शुभकामनाएं एवं बधाईयां दीं।

डॉ० प्रतिभा गुप्ता 'माही'
संस्थापिका/अध्यक्षा
एम० के० साहित्य अकादमी (रजि०) पंचकूला'
 

पुस्तक लोकार्पण एवं अखिल भारतीय कवि सम्मेलन तथा वरिष्ठ नागरिक काव्यपाठ

( वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जयंती के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय साहित्यिक महोत्सव ) पुस्तक लोकार्पण एवं अखिल भारतीय कवि सम्मेलन  तथा वरिष्ठ नाग...