एम० के० साहित्य अकादमी (रजि०) पंचकूला द्वारा आज दिनांक - 27/02/2022 (दिन- रविवार) समयः 10:30 A.M. पर प्लाट नम्बर-376 , इंडस्ट्रियल एरिया फेज-1, पंचकूला के प्रांगण में सबरस कवि दरबार का आयोजन मुख्य अतिथि ओ०पी०सिहाग तथा विशिष्ट अतिथि डॉ० अनीश गर्ग व श्री अशोक नादिर के सानिध्य में किया गया। श्री गणेश दत्त ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की तथा डॉ प्रतिभा 'माही' ने मंच का कार्यभार सँभालते हुए माँ सरस्वती की वन्दना कर, दीप प्रज्वलित करवाया ।
कार्यक्रम में उपस्थित गरिमा गर्ग, रेनू अब्बी, नीरू मित्तल, कंचन भल्ला, डेज़ी बेदी, डॉ० अनीश गर्ग, चमन लाल , अशोक नादिर, गणेश दत्त व डॉ० प्रतिभा 'माही' अपनी-अपनी रचनाओं से सभी श्रोताओं के मन मोह लिया । आज का यह कवि दरबार सम्पूर्ण दृष्टि से सफल रहा। जिसका पूरा श्रेय संयोजक श्री सतीश अवस्थी को जाता है जो कि संस्कार भारती पंचकूला इकाई के महामंत्री हैं। एम० के० साहित्य अकादमी संस्था प्रतिमाह इस तरह आयोजनों को करवाती रहती है। कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों ने डॉ० प्रतिभा माही के जज़्बे को सराहा।
मैं तुमसे प्यार नहीं करती
लेकिन इनकार नहीं करती
गुम रहती तेरे ख्वाबों में
पर मैं इक़रार नहीं करती
कहती हूँ अपना हाल-ए-दिल
बस मैं इज़हार नहीं करती
तेरी बज़्म में रहना भाता है
पर ये स्वीकार नही करती
मेरी रग रग *माही* बसता है
उससे तक़रार नहीं करती
© डॉ० प्रतिभा माही
हम तो यूं ही आए थे किसी काम से महफ़िल में,
देखा जो तुमको बस फिर किसी काम के ना रहे....
बेचैनियां बेकरारियां और उल्फ़तों से हो गई यारियां,
करवटों की कसम फिर कभी हम आराम से ना रहे....
सुना था ग़र इश्क नचाए नाच तो नाचना पड़ता है,
ग़ोया पानी भी यूं मयख़ाने की मय बनके चढ़ता है,
तेरा ज़िक्र तेरी यादों से हो जाता है नशा बोतल का,
तेरे ख़्याल के बाद मुद्दत से यारों की शाम के ना रहे...
हम तो यूं ही आए थे किसी काम से महफ़िल में,
देखा जो तुमको बस फिर किसी काम के ना रहे....
देखते थे हंसते थे दीवानों की दीवानग़ी पर हम कभी,
ये अलग बात है अब देखकर हाल मेरा हंसते हैं सभी,
सौदाईयों की फेरहिस्त में अब शुमार मेरा होने लगा,
'अनीश' अब ना काबिल ना दुआ के ना सलाम के रहे..
हम तो यूं ही आए थे किसी काम से महफ़िल में,
देखा जो तुमको बस फिर किसी काम के ना रहे....
डा० अनीश गर्ग, चंडीगढ़
youme.trust@gmail.com
ये जो मोहब्बत है
अगर तुमसे नज़रें इनायत न होती
हमें आपसे फिर मुहब्बत न होती
यूं पलकें जो हमने उठाई ना होती
कभी भी यूं इजहारे चाहत न होती
तिरी सादगी छू न जाती मुझे गर
तो यूं हमसे तेरी इबादत न होती
अगर अश्क़ ना बहते आंखो से मेरे
तो यादों की तेरी हिफाज़त न होती
यूं ख़्वाबों में उससे मुलाकात ना हो
टुटे दिल की मेरे मुरम्मत न होती
पहन लेते मेरी कलाईयों को तुम
बिछड़ने की तुझसे अजीयत न होती
यूं रूहों में गर हम फना ही न होते
ये इश्क़ ए कहानी ...सलामत न होती
ये बरखा सी यूं ना बरसती जो आंखे
तो नादां ए दिल में हरारत न होती
यूं मिल जाते हम दोनो इश्के़ वफा संग
तो दिल की भी कच्ची इमारत न होती
रहे जितना भी तू खफा़ मुझ से दिलबर
ये है इश्क़ ....वरना यूं खिदमत न होती
तिरे ग़म में डूबे है यूं इस क़दर हम
ना गिरते गर अश्क़ तो राहत न होती
©डेज़ी बेदी जुनेजा , चंडीगढ़
वादा करो आप से करो देश कुछ हित काम
खुद से किये वादे को खुद याद करो दिन रात
निभाया वादा खुद तो बढ़ेगा जीवन का दाम
जीवन अनमोल हैं करो खुद पर अभिमान
साकार करो ख्यालों को पलकों के मेहमान
खुशमय जीवन खुद का दूसरो को आराम
मिठास घुले जीवन मे भरे सभी दुखते घाव
जीवन बने सुखमय चाहे हो कोई उम्र पड़ाव
मेरा मेरा करते सभी क्यों घर हो या बहार
अंत समय सब रह जायेगा सजे रहेंगे बाजार
कठपुतली बन चलती जिंदगी सुबह और शाम
काम काम का जिंदगी में होता नही कोई विराम
वादा करो खुद जिंदगी से जिओ इसे खुशहाल
जब मिलेगा कोई ऐसा हल नही हुए जब बेज़ान
समय समय का आभाव कहे जीते जी नादान
समय का क्या करोगे बचेंगे नही शरीर मे प्राण
वादा करो आप से करो देश हित कुछ काम
खुद से किये वादे को खुद याद करो दिन रात
गरिमा गर्ग , पंचकूला
बिटिया
चहकती महकती है मुस्कान बिटिया
मखमली कली सी है नादान बिटिया
जिसे देख पड़ती कलेजे में ठंडक
वही मेरा गौरव मेरी शान बिटिया
लिपट के गले से मिले चैन दिल को
रहे प्यार निष्ठा से धनवान बिटिया
सजे सात सुर मुस्कुराए कभी तो
निराली सुरीली मधुर तान बिटिया
धरा पर उतर के सजाया धरा को
है परियों की रानी सी नादान बिटिया
धमाचौकड़ी रात दिन जो मचाए
मुहब्बत ओ' मस्ती का तूफान बिटिया
बदलती निगाहें जमाने की देखी
चुभे जो नजर हो परेशान बिटिया
जमाना जो वहशी दरिंदा हो जाता
बनाओ सभी लोग बलवान बिटिया
नीरू मित्तल 'नीर' पंचकूला
जिंदगी तुझ से हर कदम पर समझौता क्यो किया जाये, शौक जीने का है परन्तु इतना भी नहीं,
कि मर मर कर जिया जाये।
और चार दिन की जिंदगी है,
हसके जी लो कोई गम है तो चाय पी लो ।
कंचन भल्ला , चंडीगढ़
*प्रेरणा*
*जीवन* में मन खिले उमंगों से,
*प्रेरणा* मिले हम सबको *रंगों से* ।
*लाल* रंग से स्वास्तिक बने,
संसार में सबका *मंगल* करें।
*पीला* रंग पितांबर एवं बसंत से,
खिलाया *फूल * मधुर प्रेम सुगंध* के।
*नीला* रंग आसमान एवं सागर के,
*प्रेरणा* है जो,*शाश्वत और असीमता* के।
*हरा* रंग चारों तरफ *हरियाली* करें,
मानव के *सात चक्रों * को *संतुलित* करें।
*संतरी* रंग मन में * उर्जा* करें,
*देश भक्ति* की भावना भरे।
*जामुनी* रंग "विष* की याद दिलाएं ,
घृणा, ईर्ष्या , दुष्ट भाव ,*विषाद तजें*।
*सात रंगों* से बना* इंद्रधनुष* ,
नभ में छटा *बिखेरे तरंगों* से।
*सात संगीत* के सुर इसमें घुले,
हमारी *कुंडलियों को जागृत* करें।
*धर्म ,अर्थ ,काम, मोक्ष*,पर नियंत्रण करें,
*सूर्य* के समान हम* स्वर्ण* बने।
*मिट्टी,, पानी, हवा,उर्जा, आकाश,* सुरक्षित करें,
*आरोग्य,सुगंधिम,ऊर्जावान, अमृत ,खुशहाल* बने।
© रेणु अब्बी'रेणू', चंडीगढ़
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