इश्क़ की हूँ मैं देवी कयामत भी हूँ
कुछ मचलते दिलों की इबादत भी हूँ
मैं हूँ रब की गजल और माही तेरी
हर नज़र में छुपी इक शरारत भी हूँ
© डॉ० प्रतिभा 'माही'
बेज़ुबाँ बन्दों की इक बदिन मैं ज़ुबाँ हो जाऊँगी
छीन मत लेना कभी तू ये कलम इस हाथ से
सांस भी रुक जाएगी और मैं फ़ना हो जाऊँगी
© डॉ० प्रतिभा 'माही'
ख़ुद से कितने गिले क्या कहें
क्यूँ हैं लव ये सिले क्या कहें
तेरे दर तक पहुँच तो गये
पाँव कितने छिले क्या कहें
© डॉ० प्रतिभा 'माही'
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